खामेनेई के बाद उनकी पत्नी मंसूरेह का भी निधन, ईरान में शोक और तनाव गहराया
तेहरान। ईरान और इजराइल-अमेरिका संघर्ष के बीच ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की पत्नी मंसूरेह खोझस्तेह बघेरजादेह का भी निधन हो गया है। ईरानी सरकारी मीडिया ने पुष्टि की है कि हालिया संयुक्त अमेरिकी-इजराइली हवाई हमलों में घायल हुई मंसूरेह ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
बताया गया है कि दो दिन पहले हुए हमले में खामेनेई की मौत हो गई थी, जबकि उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। चिकित्सा प्रयासों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।
1964 में हुआ था विवाह
मंसूरेह खोझस्तेह बघेरजादेह ने 1964 में अयातुल्ला अली खामेनेई से मशहद में पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया था। उस समय खामेनेई एक युवा धर्मगुरु के रूप में सक्रिय थे।
1947 में मशहद में जन्मीं मंसूरेह एक धार्मिक परिवार से संबंध रखती थीं। उनके पिता आयतुल्लाह मोहम्मद बघेर खोझस्तेह मशहद के प्रतिष्ठित धर्मगुरु माने जाते थे।
सार्वजनिक जीवन से दूरी
सुप्रीम लीडर की पत्नी होने के बावजूद मंसूरेह ने सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन से दूरी बनाए रखी। उनका दायरा मुख्य रूप से पारिवारिक और धार्मिक गतिविधियों तक सीमित रहा।
उनके छह बच्चे हैं—चार बेटे और दो बेटियां। परिवार आम तौर पर मीडिया से दूर रहा है। सादगीपूर्ण और लो-प्रोफाइल जीवन शैली के लिए जानी जाने वाली मंसूरेह ईरान के धार्मिक-राजनीतिक ताने-बाने का एक अहम, लेकिन पर्दे के पीछे रहने वाला हिस्सा मानी जाती थीं।
उनके निधन के साथ ही ईरान में शोक और अनिश्चितता का माहौल और गहरा गया है, जबकि क्षेत्रीय तनाव पहले से ही चरम पर है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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