बुराई हमेशा सच्चाई की छाया में ही पलती है। यदि कोई व्यक्ति धोखे और बेईमानी से सम्पन्न दिखाई देता है, तो इसका कारण यह नहीं कि बेईमानी में शक्ति है, बल्कि यह है कि लोग उसे अभी भी सच्चा और ईमानदार समझ रहे होते हैं। उसकी सफलता का आधार दूसरों का विश्वास होता है।
यदि बेईमानी वास्तव में शक्तिशाली होती, तो लोग खुले रूप से उसकी प्रशंसा करते। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। यहां तक कि बेईमान व्यक्ति भी सार्वजनिक रूप से बेईमानी की निंदा ही करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज की मूल स्वीकृति सच्चाई को ही प्राप्त है, असत्य को नहीं।
बेईमानी की शक्ति वास्तविक नहीं, बल्कि कृत्रिम होती है। यह थोड़े समय के लिए प्रभावशाली प्रतीत हो सकती है, परंतु समय के साथ उसका आवरण स्वयं ही उतर जाता है। सत्य की जड़ें गहरी होती हैं, जबकि असत्य की नींव खोखली होती है।
मनुष्य अक्सर भोग और विलास की इच्छा में बेईमानी के मार्ग पर चल पड़ता है। अधिक सुख-सुविधाओं की लालसा, दिखावे की प्रवृत्ति और तृष्णा उसे असंतोष की ओर ले जाती है। जितनी अधिक आवश्यकताएँ बढ़ती हैं, उतनी ही शांति कम होती जाती है।
जीवन में पुरुषार्थ करिए, परिश्रम से धन अर्जित करिए, परंतु अनावश्यक वस्तुओं और दिखावे के लिए अपनी आंतरिक शांति को न खोइए। सच्चाई और संतोष ही स्थायी सुख के आधार हैं।

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