नींद में ‘जेंडर गैप’! क्यों महिलाएं सोती हैं कम?

नई दिल्ली। दुनियाभर में किए गए कई अध्ययनों से एक अहम और दिलचस्प तथ्य सामने आया है कि महिलाओं और पुरुषों की नींद में स्पष्ट अंतर है, जिसे "जेंडर स्लीप गैप" कहा जा रहा है। यह सिर्फ नींद की मात्रा का फर्क नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता और उससे जुड़े मानसिक प्रभावों का भी मामला है।
2017 के एक अध्ययन के अनुसार, 45 साल से कम उम्र की केवल 48 फीसदी माताएं ही रोजाना कम से कम 7 घंटे की नींद ले पाती हैं, जबकि बिना बच्चों वाली 62 फीसदी महिलाएं इतनी नींद लेती हैं। इससे यह साफ होता है कि मातृत्व महिलाओं की नींद पर गहरा असर डालता है। इसी तरह 2025 में 'स्लीप साइकल' की एक वैश्विक रिपोर्ट में पाया गया कि 57 फीसदी महिलाएं औसतन सामान्य मूड के साथ जागती हैं, जो पुरुषों के मुकाबले करीब तीन अंक कम है। यह अंतर भले ही छोटा लगे, लेकिन यह लगातार नींद की कमी और खराब गुणवत्ता की ओर इशारा करता है। महिलाओं की नींद अक्सर बार-बार टूटती है और उन्हें गहरी नींद कम मिलती है, जिससे शरीर और दिमाग को पूरा आराम नहीं मिल पाता। इसके पीछे एक बड़ा कारण जीवन के अलग-अलग चरणों में होने वाले हार्मोनल बदलाव हैं, जैसे मासिक धर्म, गर्भावस्था और मेनोपॉज, जो नींद के पैटर्न को प्रभावित करते हैं।
ये भी पढ़ें नवरात्रि विशेष: हल्का, पौष्टिक और थकान दूर करने वाला आहार 'साबूदाना,' व्रत में सेहत का रखे खास ख्याल इसके साथ ही सामाजिक कारण भी उतने ही अहम हैं। परिवार और बच्चों की देखभाल, घर और काम के बीच संतुलन, और लगातार रहने वाला मानसिक दबाव महिलाओं की नींद को और कमजोर कर देता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं का दिमाग दिनभर अधिक मल्टीटास्किंग और भावनात्मक प्रोसेसिंग करता है, जिसके कारण उन्हें रिकवरी के लिए पुरुषों की तुलना में ज्यादा नींद की जरूरत होती है। लेकिन जब यह जरूरत पूरी नहीं होती, तो इसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देता है। लगातार नींद की कमी से महिलाओं में थकान, चिड़चिड़ापन, तनाव, हार्मोनल असंतुलन और दिल तथा मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में “जेंडर स्लीप गैप” को समझना और इसे कम करने के लिए जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है, क्योंकि अच्छी नींद केवल आराम नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य की बुनियाद है।
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