जब बच्चे अंगूठा चूसे
अक्सर वे माएं परेशान होती देखी जाती हैं जिनके बच्चे अंगूठा चूसते हैं। बहुत छोटी अवस्था में तो बच्चों का अंगूठा चूसना अच्छा लगता है क्योंकि बच्चे शांत सोए रहते हैं पर ज्यों-ज्यों बच्चा उम्र में बढऩे लगता है तो बच्चों की इस आदत से माता-पिता की परेशानियां भी बढऩे लगती हैं। कितने ही तरीकों […]
अक्सर वे माएं परेशान होती देखी जाती हैं जिनके बच्चे अंगूठा चूसते हैं। बहुत छोटी अवस्था में तो बच्चों का अंगूठा चूसना अच्छा लगता है क्योंकि बच्चे शांत सोए रहते हैं पर ज्यों-ज्यों बच्चा उम्र में बढऩे लगता है तो बच्चों की इस आदत से माता-पिता की परेशानियां भी बढऩे लगती हैं। कितने ही तरीकों का प्रयोग किया जाता है कि बच्चे इस आदत को आसानी से त्याग दें।
बच्चे अंगूठा क्यों चूसते हैं:- अक्सर बचपन में भूख से रोते बच्चे के मुंह में जब अंगूठा चला जाता है तो वे उसे चूसकर शांत हो जाते हैं। काम करने वाली माताएं खुश रहती हैं कि इतने समय में अपना घर का काम निपटा लें जब तक बच्चा चुपचाप खेल रहा है या सोया हुआ है। सरलता से बच्चों को अंगूठा उपलब्ध हो जाने पर बच्चे इसे स्वीकार कर लेते हैं और इस आदत को अपना लेते हैं। कई माताएं बच्चों को चूसनी देकर अपने कामों में व्यस्त हो जाती हैं जिसका प्रभाव बच्चे के गले व तालू पर पड़ता है।
कुछ माताएं बच्चों की भूख प्यास की परवाह नहीं करती। जो माताएं बच्चों की भूख का समय पर ध्यान रखती हैं, उनके बच्चे इस आदत के शिकार नहीं होते। कुछ कामकाजी माताएं बच्चों से लम्बे समय तक अलग रहती हैं और उनको अपना दूध समय पर नहीं दे पाती। पीछे आया या परिवार के अन्य सदस्य उसकी भूख प्यास का पूरा ध्यान नहीं रख पाते हैं। ऐसे बच्चे भी चूसनी और अंगूठा चूसने लगते हैं।
अकेलेपन के कारण बच्चे स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं। ऐसे में माता-पिता बच्चों को पूरी सुरक्षा प्रदान करें। अंगूठा चूसने वाले बच्चों का अंगूठा झट से न खींचें। पट्टी पलस्तर आदि भी न लगायें। कोई कड़वा खाद्य पदार्थ मिर्च आदि बच्चों के अगूंठे पर न लगायें। वही अंगूठा बच्चा आपसे छुपकर मुंह में डाल लेगा जो बच्चे के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
मिर्च वाले हाथ बच्चा आंख-नाक में डाल सकता है। पट्टी प्लस्तर चूस लेने पर पेट में संक्र मण होने का खतरा रहता है।
ऐसे में जब बच्चा अंगूठा चूसने लगे तो उसका ध्यान किसी दूसरी ओर लगाएं। उसके साथ खेलें और कहानी सुनाएं। बार-बार न टोकें। उसे कुछ रचनात्मक कामों में व्यस्त करें। कुछ हटकर प्यार-दुलार दें। ऐसा सब करने पर बच्चा अंगूठा चूसने की इस आदत को छोडऩे में समर्थ हो सकता है। जैसे ही शैशवास्था में बच्चे की आदत देखें, उस पर पूरा ध्यान दें। यदि भूख का समय हो गया है तो उसे खाना या दूध दें। कुछ गोदी में लेकर खेलें, बातें करें।
अंगूठा चूसने के नुकसान:-
– अंगूठा चूसने वाले बच्चों की भूख कम हो जाती है जिससे बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।
– हाथों और उंगलियों पर लगा गंद बच्चों के पेट में चला जाता है जिससे बच्चों का पेट खराब हो सकता है। बच्चे बार बार बीमार पड़ जाते हैं।
– ऐसे बच्चे अंतर्मुखी व शर्मीले स्वभाव के बन जाते हैं।
– चूसने वाला अंगूठा सामान्य अंगूठे से पतला लगता है।
– बच्चे दूसरों की बातों से बेखबर अपने में मस्त रहते हैं। इससे बच्चों का मानसिक विकास पूरा नहीं हो पाता।
– अंगूठा, उंगली चूसने से दांतों का आकार बिगड़ जाता है जिसका प्रभाव बच्चे की शक्ल पर पड़ता है।
– तालू और गले पर भी कुप्रभाव पड़ता है। कभी कभी बच्चे तोतला बोलना या हकलाना शुरू कर देते हैं।
– अंगूठा चूसने से मस्तिष्क के नाजुक तंतुओं में तोड़ फोड़ होती रहती है।
– बड़े होने पर अन्य लोगों के बीच बैठने पर हीन भावना के शिकार हो जाते हैं।
– ऐसे बच्चे आलसी और कमजोर होते हैं।
– सुनीता गाबा
आपको यह खबर कैसी लगी? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर दे। आपकी राय रॉयल बुलेटिन को और बेहतर बनाने में बहुत उपयोगी होगी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हमें फॉलो करें और हमसे जुड़े रहें।
(Follow us on social media platforms and stay connected with us.)
Youtube – https://www.youtube.com/@RoyalBulletinIndia
Facebook – https://www.facebook.com/royalbulletin
Instagram: https://www.instagram.com/royal.bulletin/
Twitter – https://twitter.com/royalbulletin
Whatsapp – https://chat.whatsapp.com/Haf4S3A5ZRlI6oGbKljJru
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
रॉयल बुलेटिन के संस्थापक एवं मुख्य संपादक अनिल रॉयल ने वर्ष 1985 में मात्र 17 वर्ष की आयु से मुज़फ्फरनगर की पावन भूमि से निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता का संकल्प लिया। बीते लगभग चार दशकों से वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सशक्त और विश्वसनीय आवाज़ के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
पत्रकारिता के अपने लंबे अनुभव के आधार पर उन्होंने वर्ष 2010 में नोएडा से रॉयल बुलेटिन के प्रिंट संस्करण का सफल विस्तार किया। समय के साथ बदलते मीडिया परिदृश्य को समझते हुए, उनके नेतृत्व में यह संस्थान आज एक मजबूत और प्रभावशाली डिजिटल समाचार मंच के रूप में स्थापित हो चुका है।
वर्तमान में रॉयल बुलेटिन की पहुँच न्यूज़ पोर्टल, फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप सहित सभी प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर करोड़ों पाठकों तक है। प्रिंट और डिजिटल मीडिया के स्वामी एवं संपादक के रूप में अनुभव, सत्यनिष्ठा और जन-सरोकार उनकी पत्रकारिता की मूल आधारशिला रहे हैं।

टिप्पणियां