ईरान में मानवीय संकट: 32 लाख लोग बेघर, शरणार्थी शिविरों में क्षमता से अधिक भीड़
नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) के अनुसार, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध के कारण अब तक करीब 32 लाख लोग ईरान के भीतर ही विस्थापित हो चुके हैं। एजेंसी ने कहा कि यह आंकड़ा देशभर में विस्थापित परिवारों के शुरुआती आकलन के आधार पर तैयार किया गया है। यूएनएचसीआर के मुताबिक अगर संघर्ष जारी रहा तो विस्थापितों की संख्या और बढ़ सकती है, जिससे मानवीय संकट और गहरा जाएगा।
अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद 28 फरवरी से ईरान में युद्ध जारी है, जिसके कारण लाखों लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित जगहों की ओर जाने को मजबूर हुए हैं। एजेंसी के अनुसार, देश के रिफ्यूजी परिवारों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ा है, जिनमें ज्यादातर अफगान हैं। उनकी पहले से ही हालत काफी दयनीय है। बढ़ती असुरक्षा और जरूरी सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण परिवार प्रभावित इलाकों को छोड़ रहे हैं। एजेंसी ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत बॉर्डर क्रॉस कर दूसरी जगह जाने को तत्पर लोगों के लिए स्थिति अनुकूल करने की वकालत की है।
कहा है कि ऐसे लोग जो सुरक्षित रहना चाहते हैं उनके लिए बॉर्डर खोल दिए जाने चाहिए। वहीं, इस सैन्य संघर्ष में कई लोगों की जान भी जा रही है, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं। तसनीम न्यूज एजेंसी के अनुसार, ईरान सरकार की प्रवक्ता फतेमेह मोहजेरानी ने एक वीडियो इंटरव्यू में आंकड़ों की जुबानी बदहाली की कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि हमलों में कुल 216 महिलाएं, 18 साल से कम उम्र के 198 किशोर और पांच साल से कम उम्र के 11 बच्चे मारे गए। सबसे कम उम्र का शिकार आठ महीने का बच्चा था, जबकि सबसे कम उम्र का घायल व्यक्ति चार महीने का शिशु है। मोहजेरानी ने मेडिकल केंद्रों को हुए नुकसान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 21 इमरजेंसी यूनिट को नुकसान पहुंचा है, जिनमें से तीन पूरी तरह से तबाह हो गई हैं। मरने वाले हेल्थकेयर वर्कर्स की संख्या भी 12 हो गई है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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