तिरंगे में लिपटकर घर लौटा शेरपुर का लाल शहीद सुधीर नरवाल , पूरे सैन्य सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार
यमुनानगर। जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में हुए दर्दनाक सड़क हादसे में शहीद हुए वीर सपूत सुधीर नरवाल का पार्थिव शरीर शनिवार को हरियाणा के यमुनानगर स्थित उनके पैतृक गांव शेरपुर पहुंचा, जहां पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। तिरंगे में लिपटे शहीद के अंतिम दर्शन के लिए गांव और आसपास के क्षेत्रों से जनसैलाब उमड़ पड़ा। हर आंख नम थी और हर जुबां पर एक ही स्वर— “शहीद अमर रहें”।
जानकारी के अनुसार, शहीद सुधीर नरवाल का पार्थिव शरीर शुक्रवार देर रात अंबाला कैंट एयरपोर्ट लाया गया था। शनिवार सुबह सेना के काफिले के साथ पार्थिव देह गांव शेरपुर पहुंची। जैसे ही तिरंगा लिपटा शव गांव में दाखिल हुआ, माहौल गमगीन हो गया। मां उर्मिला देवी, पत्नी रूबी और अन्य परिजन अपने आंसू नहीं रोक सके। अंतिम संस्कार के दौरान शहीद के सात वर्षीय पुत्र अयांश ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। मासूम बेटे के हाथों पिता को अंतिम विदाई दिए जाने का दृश्य देख वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो उठा। पत्नी रूबी और मां उर्मिला देवी बार-बार बेसुध होती रहीं, जिन्हें परिजनों और गांव की महिलाओं ने संभाला। सेना की ओर से शहीद का पार्थिव शरीर ग्रामीणों के दर्शनार्थ रखा गया। इसके बाद सेना के अधिकारियों ने परिजनों को तिरंगा सौंपा और शहीद की वीरता, कर्तव्यनिष्ठा तथा हादसे की जानकारी साझा की। ग्रामीणों ने पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और देशभक्ति के नारों से वातावरण गूंज उठा।
वर्ष 2015 में भारतीय सेना में भर्ती हुए सुधीर नरवाल बचपन से ही देश सेवा के जज्बे से प्रेरित थे। करीब दो वर्ष पूर्व उनकी तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई थी। डोडा जिले के भद्रवाह-चंबा इंटरस्टेट रोड पर खन्नी टॉप के पास सेना का वाहन करीब 400 फीट गहरी खाई में गिर गया था। इस हादसे में 10 जवान शहीद हो गए, जबकि 11 अन्य घायल हुए। सुधीर नरवाल अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। उनके पिता हरपाल सिंह का वर्ष 2017 में निधन हो चुका था, जिसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। वह दो बहनों के इकलौते भाई थे। शहादत के बाद परिवार में मां उर्मिला देवी, पत्नी रूबी और सात वर्षीय बेटा अयांश रह गए हैं।
परिजनों के अनुसार, सुधीर आखिरी बार दिवाली पर घर आए थे। बुधवार को ही उन्होंने फोन पर मां, पत्नी और बेटे से बात की थी और जल्द घर आने का भरोसा दिलाया था। फरवरी में पारिवारिक समारोह की तैयारियां चल रही थीं, जिसमें शामिल होने का उन्होंने वादा किया था। लेकिन गुरुवार शाम शहादत की सूचना ने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। गांव शेरपुर आज अपने लाल की वीरगाथा पर गर्व और उसके बलिदान के शोक—दोनों भावनाओं के बीच खड़ा है। देश ने एक जांबाज सपूत खो दिया, लेकिन उसकी शहादत आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।
