अहंकार को मद, गर्व और अभिमान जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। जैसे ही अहंकार मन में प्रवेश करता है, व्यक्ति का विवेक क्षीण होने लगता है। उसे सही और गलत का भेद समझ में नहीं आता। वह स्वाभिमान और अहंकार के अंतर को भूलकर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है। उसके व्यवहार से विनम्रता समाप्त होने लगती है और संबंधों में कठोरता आ जाती है।
अहंकार के कई कारण हो सकते हैं। शारीरिक बल, धन-संपत्ति की अधिकता, दंभ, तपस्या का गर्व, चरित्र का बड़प्पन, पद का प्रभाव—इनमें से किसी भी आधार पर उत्पन्न अहंकार व्यक्ति को भीतर से असंतुलित कर देता है। संवेदनाएँ धीरे-धीरे क्षीण हो जाती हैं और मन में राग-द्वेष जन्म लेने लगता है। जब अहंकार को ठेस पहुँचती है, तो क्रोध बढ़ता है और बदले की भावना पनपती है। इससे समय और शक्ति का दुरुपयोग होता है तथा व्यक्ति अपने आत्मविकास से दूर होता चला जाता है।
अहंकार का प्रभाव केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता। पारिवारिक जीवन में असंतोष और सामाजिक जीवन में दूरी उत्पन्न हो जाती है। परिवार के सदस्य उपेक्षित महसूस करते हैं और समाज में भी व्यक्ति की छवि प्रभावित होती है। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, शक्तिशाली या विद्वान मानकर दूसरों को हीन समझना ही अहंकार का मूल स्वरूप है।
वास्तव में अहंकार से केवल हानि होती है, लाभ कुछ भी नहीं। फिर भी अज्ञानवश मनुष्य इसे अपनी प्रतिष्ठा समझ बैठता है। इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति आत्मचिंतन, विनम्रता और संयम को अपनाए, ताकि जीवन में संतुलन और विकास बना रहे।

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