पोते-पोतियों की देखभाल से बुजुर्गों का ब्रेन रहता है एक्टिव: शोध
नई दिल्ली। अपने नाती-पोतों की देखभाल को अक्सर पारिवारिक जिम्मेदारी या भावनात्मक जुड़ाव का नतीजा माना जाता है, लेकिन अब विज्ञान ने इसके एक और महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान खींचा है। हाल ही में छपी एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, पोते-पोतियों या नाती-नातिन की देखभाल करने वाले बुजुर्गों की स्मरण शक्ति और भाषा से जुड़ी मानसिक क्षमताएं उन बुजुर्गों की तुलना में बेहतर होती हैं जो इस भूमिका में शामिल नहीं होते हैं।
इन परीक्षणों में खास तौर पर याददाश्त, शब्दों के प्रयोग और भाषा कौशल जैसी क्षमताओं को परखा गया। शोध के नतीजों से पता चला कि जो बुज़ुर्ग अपने पोते-पोतियों की देखभाल कर रहे थे, उन्होंने मेमोरी और वर्बल स्किल्स से जुड़े परीक्षणों में बेहतर प्रदर्शन किया। दिलचस्प बात यह रही कि यह सकारात्मक प्रभाव इस बात पर निर्भर नहीं करता था कि ग्रैंड पेरेंट्स कितनी बार बच्चों की देखभाल करते हैं या वे किस तरह की देखभाल करते हैं। चाहे देखभाल नियमित हो या कभी-कभार, और चाहे वह पढ़ाने, खेलने या रोजमर्रा की निगरानी तक सीमित हो, मानसिक लाभ लगभग समान पाए गए। इससे यह निष्कर्ष निकला कि सबसे महत्वपूर्ण तत्व है देखभाल की भूमिका में सक्रिय रूप से शामिल होना। शोधकर्ताओं का मानना है कि बच्चों के साथ समय बिताने से बुज़ुर्गों का सामाजिक संपर्क बढ़ता है और उनका दिमाग लगातार सक्रिय रहता है।
बच्चों की जरूरतों को समझना, उनसे बातचीत करना और उनके साथ गतिविधियों में शामिल होना दिमाग को चुनौती देता है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता बनी रहती है। इसके अलावा जुड़ाव बुज़ुर्गों के जीवन में उद्देश्य और जिम्मेदारी का भाव भी पैदा करता है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए अहम माना जाता है। अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि बढ़ती उम्र में मानसिक गिरावट को पूरी तरह टालना शायद संभव न हो, लेकिन जीवनशैली और सामाजिक भूमिका इसमें बड़ा फर्क डाल सकती हैं। परिवार के भीतर सक्रिय रहना, खासकर अगली पीढ़ी की देखभाल में भागीदारी, बुज़ुर्गों को न सिर्फ भावनात्मक संतोष देती है बल्कि उनके दिमाग को भी स्वस्थ रखने में मदद कर सकती है।
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