हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: निजी संपत्ति में धार्मिक आयोजन पर नहीं लग सकती रोक, नमाजियों की संख्या तय करने वाली सरकार की दलील खारिज
अनुच्छेद 25 की बड़ी व्याख्या: कानून-व्यवस्था का हवाला देकर धार्मिक अधिकारों को सीमित करना गलत

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसका अभ्यास करने का समान अधिकार देता है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी निजी परिसर या निजी संपत्ति में पूजा या धार्मिक आयोजन करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, जब तक कि उससे सार्वजनिक व्यवस्था या शांति भंग न हो रही हो।
20 नमाजियों की पाबंदी को कोर्ट ने नकारा
यह आदेश संभल में नमाजियों की संख्या सीमित करने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया। कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें नमाजियों की संख्या केवल 20 तक सीमित करने की बात कही गई थी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पूजा करने वालों की संख्या पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जा सकती और कानून-व्यवस्था के नाम पर किसी के मौलिक धार्मिक अधिकारों का हनन उचित नहीं है।
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ये भी पढ़ें चंदौली: दो SDM के बीच हाई-प्रोफाइल विवाद; ससुर ने दामाद पर लगाया नपुंसकता और ब्लैकमेलिंग का आरोपकोर्ट ने अनुच्छेद 25 की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि यह अधिकार केवल आस्तिकों के लिए ही नहीं, बल्कि एक नास्तिक के लिए भी है कि वह तर्क और विज्ञान के आधार पर अपनी बात रखे। कोर्ट ने चेतावनी भी दी कि धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ में किसी को दूसरे धर्म के खिलाफ नफरत फैलाने या उकसाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो अपराधी को कठोर कानूनी कार्रवाई का सामना करना होगा।
प्रशासन को सुरक्षा देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि यदि किसी व्यक्ति के निजी स्थान पर होने वाली प्रार्थना में कोई बाहरी समूह हस्तक्षेप करता है, तो प्रशासन को वहां सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। इस आदेश की प्रति डीजीपी और अपर मुख्य सचिव गृह को भेजी गई है ताकि इसे निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों तक पहुंचाकर अनुपालन सुनिश्चित कराया जा सके।
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