संयुक्त परिवार की साझा कमाई से खरीदी प्रॉपर्टी 'बेनामी' नहीं, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा है कि संयुक्त हिंदू परिवार की साझा आमदनी से खरीदी गई सम्पति को बेनामी सम्पत्ति नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने गोरखपुर के दो भाइयों के बीच चल रहे विवाद में ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मुकदमे को फिर से सुनवाई के लिए भेज दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन ने गोरखपुर के ओम प्रकाश गुप्ता की अपील पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम 1988 की गलत व्याख्या के आधार पर वाद खारिज किया था। जबकि मामला संयुक्त हिंदू परिवार की सम्पत्ति से सम्बंधित है और इसमें साक्ष्यों के आधार पर तथ्यात्मक जांच की आवश्यकता है।
ओम प्रकाश गुप्ता ने अपने बड़े भाई राधेश्याम गुप्ता के खिलाफ दावा किया था कि दोनों भाइयों ने संयुक्त परिवार के रूप में लकड़ी और गन्ने का व्यवसाय शुरू किया था। इसी व्यवसाय से अर्जित आय से गोरखपुर में कई जमीन और मकान खरीदे गए। कुछ संपत्तियां भाई के नाम, कुछ मां के नाम और कुछ बेटों के नाम दर्ज कराई गईं लेकिन सभी की खरीद साझा पूंजी से की गई थी। बाद में जब बड़े भाई ने हिसाब देने और बंटवारे से इनकार कर दिया, तो वादी ने मुकदमा किया।
ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी की अर्जी स्वीकार करते हुए वाद को बेनामी कानून के तहत अवैध मानकर खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि सीपीसी के आदेश सात नियम 11 के तहत वाद खारिज करते समय केवल वादपत्र में वर्णित तथ्यों पर ही विचार किया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि संयुक्त परिवार की आय से खरीदी गई संपत्ति बेनामी अधिनियम के दायरे से बाहर है। साथ ही ट्रायल कोर्ट को एक वर्ष के भीतर मुकदमे का निस्तारण करने और विवादित संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
