मुजफ्फरनगर: ‘जश्न-ए-जम्हूरियत’ मुशायरे में गूंजे अमन के तराने; कलीम त्यागी ‘उर्दू खिदमत’ के लिए सम्मानित
मुजफ्फरनगर। गणतंत्र दिवस की शाम सूजड़ू चुंगी स्थित इंजीनियर नफीस राना के आवास पर अदब और भाईचारे की एक यादगार महफिल सजी। सद्भावना मंच सेक्युलर फ्रंट द्वारा आयोजित ‘जश्न-ए-जम्हूरियत’ मुशायरे में शायरों ने अपनी रूहानी रचनाओं से न केवल महफिल लूट ली, बल्कि जम्हूरियत (लोकतंत्र) और संविधान की रूह को भी अल्फाजों में पिरोया। वरिष्ठ शायर हसीन हैदर जानसठी की अध्यक्षता और अल्ताफ मशल के मयारी संचालन में हुई इस महफिल ने देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा।
कलीम त्यागी का सम्मान और कौमी एकता का संदेश
शायरों के कलाम पर झूम उठे श्रोता
मुशायरे का आगाज होते ही शायरी की बारिश शुरू हो गई। आलमी शायर रियाज सागर ने जब पढ़ा— ‘मैं जुल्मतों को चीर के लाया हूं रोशनी, इस शौक में धुआं भी निगलना पड़ा मुझे’, तो पूरा पंडाल तालियों से गूँज उठा। वहीं हसीन हैदर जानसठी के शेर— ‘मैं कोई जिस्म नहीं हूं जो मर जाऊंगा, बनके अल्फाज किताबों में उतर जाऊंगा’ ने गहरा असर छोड़ा।
संचालक अल्ताफ मशल ने उर्दू की मिठास को बयां करते हुए कहा— ‘नरम अलफाज के जेवर से सजाती है मुझे, सारे आदाब ये उर्दू ही सिखाती है मुझे।’ गंगा-जमुनी तहजीब को हरि ओम शर्मा ने इन पंक्तियों में समेटा— ‘यह तो मोहब्बत का कारवां है, हम सबको अपना कहते हैं।’ इसके अलावा सलामत राही सहित कई अन्य शायरों ने भी बेहतरीन कलाम पेश किए। इस मौके पर इंजीनियर असद पाशा, डॉ. फर्रुख हसन और भारी संख्या में साहित्य प्रेमी मौजूद रहे।
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लेखक के बारे में
पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मौहम्मद शाहनवाज मुज़फ्फरनगर के एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय पत्रकार हैं। वर्तमान में आप राष्ट्रीय सहारा के जिला प्रभारी (मुज़फ्फरनगर) के रूप में कार्यरत हैं और साथ ही उत्तर प्रदेश के प्रमुख मीडिया संस्थान रॉयल बुलेटिन में संवाद सहयोगी की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। डेढ़ दशक के लंबे अनुभव के साथ मौ. शाहनवाज ने अपनी प्रखर लेखनी से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी छाप छोड़ी है। उनसे मोबाइल नंबर 9058673434 पर संपर्क किया जा सकता है।

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