यूपी में अपार्टमेंट सोसाइटियों के अनिश्चितकालीन कार्यकाल पर हाई कोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गाजियाबाद उप रजिस्ट्रार के आदेश पर लगाई रोक, 10 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी की अपार्टमेंट सोसाइटियों में पदाधिकारियों के लंबे समय तक पद पर बने रहने और सदस्यों से वोटिंग अधिकार छीनने पर चिंता जताई है। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगते हुए गाजियाबाद उप रजिस्ट्रार के आदेश पर रोक लगा दी है।
प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश की ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों में पदाधिकारियों के अनिश्चितकालीन समय तक पदों पर जमे रहने और अपार्टमेंट सदस्यों के वोट देने के अधिकार छीने जाने के मामलों पर बेहद गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने इस पूरे विषय पर राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने यह फैसला एल्डिको आमंत्रण अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन, गाजियाबाद की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया है।गाजियाबाद उप रजिस्ट्रार के आदेश को चुनौती
अदालत में गाजियाबाद के उप रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसाइटीज एंड चिट्स की ओर से 20 अप्रैल 2026 को जारी किए गए एक आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश के माध्यम से नए प्रबंध बोर्ड का गठन होने तक सोसाइटियों के पदाधिकारियों की वित्तीय शक्तियों को केवल दैनिक खर्चों तक ही सीमित कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता पक्ष की तरफ से अदालत में दलील दी गई कि सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 के नियमों में पदाधिकारियों की किसी सूची को अनंतिम मंजूरी देने का कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। इस आधार पर उप रजिस्ट्रार का आदेश अपने क्षेत्राधिकार से बाहर का है और वह शुरू से ही शून्य है।
ये भी पढ़ें गाजियाबाद में चाय पत्ती में मिला लोहे का बुरादा, खाद्य सुरक्षा विभाग ने 1860 किलो अमर लीफ टी की सीलयाचिका में यह बात भी कोर्ट के सामने रखी गई कि 29 मार्च 2026 को कराया गया चुनाव न तो अंतिम रूप से पूरा हो पाया था और न ही उस चुनाव के नतीजों का ऐलान किया गया था।
नियमों में विरोधाभास और अनिश्चितकालीन कार्यकाल
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने पहली नजर में पाया कि उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व एवं रखरखाव संवर्धन) नियमावली, 2011 के मॉडल उपविधि 26 के उपखंड (ii) और उपखंड (iii) में आपस में विरोधाभास जैसी स्थिति बनी हुई है।
अदालत ने रेखांकित किया कि एक तरफ तो पदाधिकारी का कार्यकाल एक वर्ष के लिए तय किया गया है, लेकिन दूसरी तरफ नए चुनाव संपन्न न होने तक पुराने पदाधिकारियों को ही पद पर बने रहने की छूट मिल जाती है।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस तरह के नियमों से सोसाइटियों के प्रबंधन को अपनी मनमर्जी से चुनाव टालने का मौका मिल जाता है, जिससे वे सालों तक सत्ता में बने रहते हैं। इससे प्रबंधकों की मनमानी बढ़ती है, जवाबदेही खत्म होती है और वित्तीय अनियमितता फैलने की आशंका भी बनी रहती है।
वोटिंग अधिकार और कोर्ट के सख्त निर्देश
हाई कोर्ट ने इस बात पर भी अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की कि सोसाइटियों में रखरखाव या बिजली बिल का बकाया होने का बहाना बनाकर सदस्यों को मतदान प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। अदालत ने कहा कि ऐसा करके प्रबंध बोर्ड मनमाने तरीके से अपनी पसंद की चुनिंदा मतदाता सूची तैयार कर लेता है।
इन सभी गंभीर बिंदुओं पर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के लिए अदालत ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (संस्थागत वित्त) और रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसाइटीज एंड चिट्स को हलफनामा दाखिल करने का स्पष्ट निर्देश जारी किया है।
न्यायालय ने यह आदेश भी दिया है कि इस अदालती आदेश को गाजियाबाद की सभी ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों के सूचना पट्ट यानी नोटिस बोर्ड पर चस्पा किया जाए। इसका मकसद यह है कि सोसाइटियों के सभी सदस्य, प्रबंध बोर्ड और बाकी संबंधित व्यक्ति अपने-अपने सुझाव सीधे हाई कोर्ट के सामने रख सकें।
इसके साथ ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 20 अप्रैल 2026 को जारी किए गए विवादित आदेश पर अगली सुनवाई तक पूरी तरह से रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 10 सितंबर 2026 तय की है।
रॉयल बुलेटिन से जुड़ें:
देश-प्रदेश की ताज़ा ख़बरों को सबसे पहले पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करें:

टिप्पणियां