महाशिवरात्रि: अंधकार से आत्मबोध तक की दिव्य शिव-यात्रा; केवल पर्व नहीं, चेतना के जागरण की है यह शुभ रात्रि
आधुनिक युग के 'हलाहल' विष को सोखने का मार्ग दिखाते हैं आदियोगी; बाह्य आडंबर छोड़ अंतर्मन में शिव-तत्त्व को खोजने का संदेश
सनातन चेतना में महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण की वह दिव्य घड़ी है जब साधक बाह्य संसार की चंचलता को त्यागकर अंतर्मन की गहराइयों में उतरता है। 'शिव' का अर्थ ही कल्याण है और जहाँ शिव का वास है, वहाँ भय, द्वंद्व और अज्ञान का कोई स्थान नहीं रहता। आज के भौतिकतावादी और तनावग्रस्त युग में इस पर्व की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है क्योंकि यह हमें बाहरी सफलता की दौड़ से हटाकर आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।
आधुनिक जीवन और 'हलाहल' विष का रूपक
समुद्र मंथन की कथा आज के जीवन का शाश्वत रूपक है। आज का मनुष्य भी प्रतिदिन कार्य का दबाव, प्रतिस्पर्धा, रिश्तों में खटास और भविष्य की अनिश्चितता जैसे 'हलाहल' विष का सामना कर रहा है। भगवान शिव का विषपान हमें यह संदेश देता है कि जो अपनी चेतना में स्थिर है, वही इस विष को नीलकंठ बनकर अमृत में बदल सकता है। शिव पूजन का अर्थ केवल जल या बेलपत्र अर्पण करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के काम, क्रोध और लोभ का विसर्जन करना है।
चेतना का जागरण ही सच्ची आराधना
महाशिवरात्रि का रात्रि जागरण केवल आँखों का जागना नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण की रात्रि है। आज जब समाज अवसाद और असहिष्णुता से जूझ रहा है, तब शिव का मौन हमें सिखाता है कि हर समस्या का समाधान स्थिरता में छिपा है। भगवान शिव 'आशुतोष' हैं, वे प्रदर्शन के बजाए सच्चे भाव से प्रसन्न होते हैं। एक क्षण का मौन और एक सच्ची प्रार्थना ही उन्हें प्रिय है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, हमारे भीतर विराजमान हैं। जब हम नकारात्मकता को स्वीकार कर उसे करुणा में बदल लेते हैं, तब जीवन वास्तव में शिवमय हो जाता है।
पता: स्टेशन चौराहा, नजीबाबाद रोड बिजनौर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल ÷9412452029
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