आत्मा परमात्मा पर आश्रित है, क्योंकि वह उसी का अंश है, जबकि शरीर का आश्रय आत्मा है। शरीर को आत्मा केवल सीमित अवधि के लिए प्राप्त होती है, इसलिए उसका आश्रय भी अल्पकालिक है। इसके विपरीत, आत्मा का आश्रय परमात्मा में दीर्घकालिक और स्थायी है। सत्य और नित्य भी इसी आश्रय का हिस्सा हैं; अन्य आश्रय असत्य और अनित्य हैं।
जब संसार से भरोसा टूट जाता है तो हृदय पर आघात लगता है। मन दुख और विषाद से भर जाता है, शारीरिक क्रियाएं मंद पड़ जाती हैं, और ज्ञानेन्द्रियां व कर्मेन्द्रियां संज्ञाहीन हो जाती हैं। ऐसे समय में
भगवान का भरोसा ही व्यक्ति की चेतना और मानसिक संतुलन को बनाए रखता है।
वास्तविक जीवन में भी पारस्परिक भरोसा समाज निर्माण की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभाता है। भरोसे के बिना न मानव समुदाय की कल्पना संभव है, न देश, काल, नीति या धर्म की। यदि मनुष्य को मनुष्य बने रहना है, तो भरोसा कायम रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही भरोसा है जो व्यक्ति को कठिनाइयों के बावजूद सदैव आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।