आध्यात्मिक चेतना के बिना विज्ञान: विनाश की ओर बढ़ती दुनिया
सृष्टि के रहस्य की गहनता विज्ञान में है, जबकि आत्मा के रहस्य की गहनता आध्यात्मिकता में। विज्ञान का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सुविधा और उन्नति प्रदान करना है। लेकिन जब विज्ञान मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना से दूर हो जाता है, तो यह सुविधा के बजाय भय और विनाश लाने लगता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आध्यात्मिक चेतना ही विज्ञान को दिशा देती है। यह चेतना की तकनीक है, जो मनुष्य को सृष्टि की भव्यता और जीवन के उच्चतम उद्देश्य से जोड़ती है। यदि वैज्ञानिक और शोधकर्ता केवल भौतिक लाभ में लगे रहें और अपनी आध्यात्मिक प्रकृति को जीवित न करें, तो उनका प्रयास संसार के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
सृष्टि का सुंदरतम खेल चेतना का प्रदर्शन है। जो व्यक्ति विज्ञान में लगे रहते हुए भी सृष्टि की भव्यता से विस्मित नहीं होता और अपनी आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत नहीं करता, वह कभी पूरी तरह से सृष्टि की रहस्यमयी शक्ति को नहीं समझ पाएगा।
इस संदर्भ में विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि विज्ञान और आध्यात्मिकता का संतुलन मानवता के कल्याण के लिए अनिवार्य है। केवल तकनीक और भौतिक उन्नति के साथ यदि मानवीय मूल्यों और चेतना को जोड़ा न गया, तो सृष्टि विनाश के मार्ग पर बढ़ सकती है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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