बागपत। आगामी बोर्ड परीक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बागपत जिला प्रशासन ने एक बड़ा और संवेदनशील कदम उठाया है। परीक्षा के समय बच्चों में बढ़ते मानसिक दबाव और खुद को नुकसान पहुंचाने की आशंकाओं को देखते हुए जनपद के आवासीय विद्यालयों में पंखों को एंटी-सुसाइडल रॉड युक्त बनाया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य किसी भी अप्रिय घटना को रोकना और विद्यार्थियों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना है।
जिला प्रशासन का मानना है कि परीक्षा के समय बच्चों पर पढ़ाई, अपेक्षाओं और परिणामों का अत्यधिक दबाव रहता है। ऐसे में कई बार भावनात्मक रूप से कमजोर बच्चे गलत कदम उठा लेते हैं। इसी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए बागपत प्रशासन ने रोकथाम आधारित दृष्टिकोण अपनाया है, ताकि किसी भी संभावित खतरे को पहले ही टाला जा सके।
आवासीय विद्यालयों में एंटी-सुसाइडल रॉड की स्थापना का कार्य चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। यह विशेष संरचना इस प्रकार डिजाइन की गई है कि पंखों का उपयोग किसी भी प्रकार के आत्मघाती प्रयास के लिए न किया जा सके। प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और यह कदम उनकी जान की रक्षा के लिए उठाया गया है।
इस पहल के साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि सुरक्षा उपायों का उद्देश्य बच्चों में भय पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें यह भरोसा देना है कि प्रशासन उनकी हर परिस्थिति में सुरक्षा के लिए सजग है। बागपत प्रशासन द्वारा अपनाई गई यह व्यवस्था विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर एक मजबूत संदेश देती है।
इसके साथ-साथ आवासीय विद्यालयों के शिक्षकों, वार्डनों और स्टाफ को विशेष निर्देश दिए गए हैं कि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले किसी भी बदलाव को गंभीरता से लें। बच्चों में अचानक चुप्पी, उदासी, चिड़चिड़ापन या आक्रोश जैसे संकेतों को नजरअंदाज न किया जाए। स्टाफ को यह समझाया गया है कि अनुशासन के साथ-साथ संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है।
एंटी-सुसाइड फैन रॉड्स की विशेषताएं
- दम घुटने से बचाव: इनका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यदि पंखे पर लगभग 22–25 किलोग्राम जैसा भार पड़ता है, तो स्प्रिंग-लोडेड दो-भागों वाला मैकेनिज़्म सक्रिय होकर रॉड को अलग कर देता है। इससे फाँसी के लिए आवश्यक बल नहीं बन पाता।
- भार का सुरक्षित रूप से नीचे आना: साधारण टूटने के बजाय, यह रॉड इस तरह डिज़ाइन की गई है कि पंखा धीरे-धीरे नीचे आता है, जिससे व्यक्ति सुरक्षित रूप से ज़मीन पर पहुँच जाता है और गर्दन पर घातक चोट नहीं लगती।
- गंभीर चोट से बचाव: स्प्रिंग-लोडेड प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि पंखा सीधे व्यक्ति पर न गिरे।
- रीट्रोफिटेबल और संगत: इन्हें अधिकांश मौजूदा सीलिंग फैन मॉडलों में लगाया जा सकता है, इसलिए मौजूदा ढांचे में इन्हें लागू करना आसान है।
- सामान्य उपयोग में टिकाऊ: रोज़मर्रा के उपयोग में ये मज़बूत, हेवी-ड्यूटी स्टील रॉड की तरह ही काम करती हैं और केवल तब सक्रिय होती हैं जब भार सीमा से बहुत अधिक वजन पड़ता है।
- कम लागत, बड़ा प्रभाव: ये अपेक्षाकृत किफायती हैं (आमतौर पर ₹300–₹400 के आसपास), जिससे यह एक व्यावहारिक और जीवन-रक्षक उपाय बनती हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य में सहायक हस्तक्षेप: निलंबन का बिंदु न बनने देने से हस्तक्षेप या विचार बदलने के लिए महत्वपूर्ण समय मिल सकता है।
इन रॉड्स को विभिन्न संस्थानों में अपनाया गया है, जैसे कोटा के हॉस्टल और एम्स जोधपुर।
काउंसलिंग और संवाद बना बच्चों की सुरक्षा का दूसरा मजबूत स्तंभ
सुरक्षा उपायों के साथ-साथ बागपत प्रशासन ने विद्यार्थियों की मानसिक खुशहाली के लिए काउंसलिंग और संवाद को इस पहल का दूसरा प्रमुख स्तंभ बनाया गया है। जिला प्रशासन ने जन उदय फाउंडेशन के सहयोग से विद्यालयों में विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिकों और काउंसलरों के माध्यम से संवाद सत्र शुरू किए हैं।
इन सत्रों के माध्यम से विद्यार्थियों को तनाव, चिंता और अवसाद से निपटने के व्यावहारिक उपाय बताए जा रहे हैं। बच्चों को यह समझाया जा रहा है कि परीक्षा जीवन का एक चरण है, न कि जीवन का अंतिम मूल्यांकन। काउंसलरों द्वारा सरल भाषा में मानसिक स्वास्थ्य, भावनाओं की समझ और आत्मविश्वास बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
इस अभियान का प्रथम सत्र जन उदय फाउंडेशन के सहयोग से बड़ौत के चौधरी केहर सिंह दिव्य पब्लिक स्कूल में आयोजित किया गया, जिसका शुभारंभ जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने किया। जिलाधिकारी ने संबोधन से पहले बच्चों से सीधे संवाद करते हुए एक ऐसा सवाल किया, जिसने पूरे सभागार का माहौल बदल दिया। उन्होंने परीक्षा या रिज़ल्ट की बात करने के बजाय सबसे पहले विद्यार्थियों से पूछा— “तुम ठीक हो बच्चों?” यह सवाल सुनते ही कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया, फिर बच्चों के चेहरे पर झिझक, भावुकता और भरोसे का मिला-जुला भाव दिखाई दिया। कई विद्यार्थियों ने पहली बार महसूस किया कि प्रशासन उनके अंकों से पहले उनकी भावनाओं को समझना चाहता है।
जिलाधिकारी ने कहा कि परीक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण विद्यार्थियों की जिंदगी, उनका आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन है। उन्होंने बच्चों को भरोसा दिलाया कि किसी भी परिस्थिति में वे अकेले नहीं हैं और प्रशासन उनके साथ खड़ा है। जिलाधिकारी ने स्वयं बच्चों से संवाद कर उन्हें परीक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि मेहनत जरूरी है, लेकिन डर के साथ नहीं, विश्वास के साथ।
संवाद के दौरान बच्चों ने खुलकर अपने सवाल और आशंकाएं रखीं। कई विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि परीक्षा के नाम से ही उन्हें घबराहट होने लगती है। जिलाधिकारी ने बच्चों को भरोसा दिलाया कि असफलता अंत नहीं है और हर परिस्थिति से सीखकर आगे बढ़ा जा सकता है।
कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिकों में डॉ आराधना गुप्ता एवं महामंडलेश्वर विश्रुत्पानी ने विद्यार्थियों को बताया कि मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध शारीरिक दिनचर्या से होता है। पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और नियमित दिनचर्या को तनाव प्रबंधन का आधार बताया गया। विशेषज्ञों ने समझाया कि अत्यधिक तनाव की स्थिति में स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है, जबकि शांत और प्रसन्न मन से पढ़ाई करने पर विषयों को समझना आसान होता है।
विभिन्न वैज्ञानिक तथ्यों और उदाहरणों के माध्यम से विद्यार्थियों को यह बताया गया कि परीक्षा के दौरान घबराहट को कैसे नियंत्रित किया जाए। आसान गतिविधियों के जरिए बच्चों को आत्म-नियंत्रण और सकारात्मक सोच के अभ्यास कराए गए। इसके अतिरिक्त कमजोर विद्यार्थियों के लिए उपचारात्मक शिक्षा और व्यक्तिगत मार्गदर्शन पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
जिला प्रशासन द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि किसी भी विद्यार्थी को आवश्यकता पड़ने पर तुरंत मानसिक सहायता उपलब्ध हो। इसके लिए काउंसलिंग से जुड़े संसाधनों और संपर्क माध्यमों, जैसे टेली-मानस, की जानकारी विद्यालयों में साझा की जा रही है। उद्देश्य यह है कि कोई भी बच्चा स्वयं को अकेला न समझे और समय रहते मदद प्राप्त कर सके।
इस पूरी पहल की नींव उस समय पड़ी, जब जिलाधिकारी द्वारा विभिन्न अवसरों पर विद्यार्थियों से संवाद के दौरान यह समस्या बार-बार सामने आई। स्कूल निरीक्षण और शैक्षणिक कार्यक्रमों में बातचीत के दौरान यह महसूस किया गया कि कई विद्यार्थी पढ़ाई के बावजूद भीतर से दबाव और डर से जूझ रहे हैं। कुछ बच्चों की आंखों में झिझक और आवाज़ में संकोच साफ दिखाई देता था।
जब उनसे पूछा गया कि परीक्षा को लेकर कैसा महसूस कर रहे हैं, तो किसी ने कहा, “डर लगता है”, तो किसी ने चिंता जताई कि यदि नंबर कम आ गए तो क्या होगा। इन प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट हो गया कि समस्या पढ़ाई की नहीं, बल्कि अपेक्षाओं और मानसिक दबाव की है।
अन्य जिलों के लिए अनुकरणीय पहल
बागपत प्रशासन की यह पहल यह संदेश देती है कि विद्यार्थियों की सुरक्षा और खुशहाली प्रशासन की प्राथमिकता है। एंटी-सुसाइडल रॉड जैसी ठोस सुरक्षा व्यवस्था और काउंसलिंग जैसे संवेदनशील प्रयासों का यह संयोजन एक इंटीग्रेटेड मॉडल के रूप में उभर रहा है। यह मॉडल अन्य जनपदों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है।
इस अवसर पर एसडीएम बड़ौत भावना सिंह, जिला विद्यालय निरीक्षक राघवेंद्र सिंह, मेडिसिटी अस्पताल बड़ौत के डायरेक्टर डॉक्टर मनीष तोमर ,डिप्टी कलेक्टर मनीष कुमार यादव, डॉक्टर आराधना गुप्ता, महामंडलेश्वर विश्रुत्पानी, रिटायर्ड प्रोफेसर बीवी तिवारी, डॉक्टर संध्या तिवारी सहित अन्य मौजूद रहे।
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