यूपी में हाफ एनकाउंटर पर बवाल, जेल में जाकर एसीजीएम ने की पड़ताल: कैदियों ने लगाये गंभीर आरोप, हाईकोर्ट की फटकार के बाद बढ़ी सख्ती
देवबंद/सहारनपुर। यूपी में पुलिस के ‘फुल’ और ‘हाफ एनकाउंटर’ को लेकर उठते सवालों के बीच न्यायपालिका ने सख्त रुख दिखाया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियों के महज एक सप्ताह बाद देवबंद कोर्ट के एसीजीएम परविंदर सिंह स्वयं देवबंद जेल पहुंचे और एनकाउंटर में घायल बंदियों से आमने-सामने पूछताछ की। इस दौरान कैदियों ने जो आरोप लगाए, उन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
एसीजीएम ने एनकाउंटर में घायल कैदियों को लाइन में खड़ा कर एक-एक कर पूछताछ की। बातचीत का वीडियो भी सामने आया है। एक कैदी ने दावा किया कि उसके खिलाफ कोर्ट में याचिका लंबित थी और वह तारीख पर पेशी के लिए जा रहा था, तभी पुलिस ने उसे उठा लिया और बाद में फर्जी ‘हाफ एनकाउंटर’ दिखा दिया।
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कैदी ने एसीजीएम के सवालों के जवाब में बताया—
“सहारनपुर में हमारी तारीख थी। हम बागपत से आ रहे थे। शामली पार्क के पास पुलिस ने हमें उठा लिया। चौकी ले जाकर करंट लगाया, कबूलनामा कराने की कोशिश की। जब मैंने नहीं माना तो शाम को जंगल में ले जाकर पैर के नीचे गोली मार दी।”
एसीजीएम ने पूछा, “गोली कैसे मारी गई?”
कैदी ने कहा, “पहले जमीन पर लिटाया, टांग नीचे की, ऊपर कपड़ा रख दिया और करीब 8 इंच ऊपर से गोली मारी गई। बाद में कट्टे से फायरिंग की गई।”
दूसरे घायल युवक ने भी अपने पैर दिखाते हुए इसी तरह की कार्रवाई का आरोप लगाया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
30 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस के ‘हाफ एनकाउंटर’ के तौर-तरीकों पर कड़ी नाराजगी जताई थी। जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की बेंच ने कहा था कि कुछ पुलिस अधिकारी प्रशंसा, समय से पहले प्रमोशन और सोशल मीडिया पर वाहवाही के लिए अनावश्यक रूप से गोली चला रहे हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया—
“आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। भारत में कानून संविधान के अनुसार चलता है, व्यक्तिगत सोच के आधार पर नहीं।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में आरोपी के घुटने के नीचे गोली मारकर उसे ‘हाफ एनकाउंटर’ का रूप दिया जाता है, जो कानून की नजर में पूरी तरह अस्वीकार्य है।
6 बिंदुओं पर गाइडलाइन, अफसरों को चेतावनी
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) फैसले का हवाला देते हुए छह बिंदुओं पर सख्त गाइडलाइन लागू करने के निर्देश दिए। चेतावनी दी गई कि यदि एनकाउंटर में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन नहीं हुआ तो संबंधित जिले के एसपी/एसएसपी और कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट की अवमानना का दोषी माना जाएगा।
न्यायपालिका बनाम ‘एनकाउंटर कल्चर’
देवबंद जेल में एसीजीएम की यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका अब ‘एनकाउंटर कल्चर’ के आरोपों को गंभीरता से ले रही है। अगर कैदियों के आरोपों में सच्चाई पाई गई, तो यह न केवल संबंधित पुलिसकर्मियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है, बल्कि प्रदेश में एनकाउंटर की कार्यप्रणाली पर भी व्यापक असर डाल सकता है।
फिलहाल इस मामले में पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है, लेकिन न्यायालय की सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं।
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लेखक के बारे में
गौरव सिंघल सहारनपुर के एक अनुभवी और प्रतिष्ठित पत्रकार हैं, जो पिछले 18 वर्षों (2007 से) से मीडिया जगत में सक्रिय हैं। पत्रकारिता की बारीकियां उन्होंने विरासत में अपने पिता के मार्गदर्शन में 'अमर उजाला' और 'हिन्दुस्तान' जैसे संस्थानों से सीखीं।
अपने लंबे करियर में उन्होंने इंडिया टुडे (फोटो जर्नलिस्ट), शुक्रवार, इतवार, दैनिक संवाद और यूपी बुलेटिन जैसे दर्जनों प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में अपनी सेवाएं दीं। लेखनी के साथ-साथ कुशल फोटो जर्नलिस्ट के रूप में भी उनकी विशिष्ट पहचान है।
विभिन्न राष्ट्रीय व क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों में अनुभव प्राप्त करने के बाद, वर्तमान में गौरव सिंघल सहारनपुर से 'रॉयल बुलेटिन' के साथ जुड़कर अपनी निष्पक्ष और गहरी रिपोर्टिंग से संस्थान को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।

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