सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट जजों के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई..जानिए क्या है पूरा विवाद"
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर बढ़ रहे 'अनुशासनहीनता' और 'विद्रोही रुख' की ओर इशारा करती है। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह बात विशेष रूप से कलकत्ता हाई कोर्ट के एक हालिया घटनाक्रम और कुछ अन्य हाई कोर्ट जजों के आचरण के संदर्भ में कही है।
'बीमारी' और 'संक्रमण' का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने "पहचानी हुई बीमारी" (Identified Malady) शब्द का प्रयोग उन जजों के लिए किया जो सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करते हैं या सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ आदेश पारित करते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को चुनौती देने लगेंगे, तो पूरी न्यायिक व्यवस्था ढह जाएगी। पीठ ने चिंता जताई कि कुछ जज कानूनी प्रक्रियाओं से ऊपर अपने 'व्यक्तिगत मत' को रख रहे हैं, जो एक खतरनाक संक्रमण की तरह फैल सकता है।
क्यों कही यह बात? (प्रमुख कारण)
जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय (अब सेवानिवृत्त) और जस्टिस सौमेन सेन के बीच हुआ टकराव सबसे बड़ा कारण बना। एक जज ने दूसरे जज के आदेश को अवैध घोषित कर दिया था और सीबीआई जांच को लेकर आपस में ही आदेशों की जंग छिड़ गई थी। कुछ मामलों में देखा गया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी कार्यवाही पर रोक (Stay) लगा दी, तब भी हाई कोर्ट के जजों ने उस पर सुनवाई जारी रखी या आदेश पारित किए।जजों द्वारा कोर्ट रूम में या फैसलों में सरकार या अन्य संस्थानों के खिलाफ अनावश्यक और 'राजनीतिक' झुकाव वाली टिप्पणियाँ करना।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में पदानुक्रम (Hierarchy) का सम्मान अनिवार्य है। "अगर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करेंगे या अपनी ही पीठ के खिलाफ विद्रोह करेंगे, तो आम जनता का न्याय से भरोसा उठ जाएगा। इस 'बीमारी' को शुरुआत में ही रोकना होगा, वरना यह पूरी प्रणाली को दूषित कर देगी।" सुप्रीम कोर्ट अब हाई कोर्ट के जजों के लिए एक नया 'गाइडलाइन' या 'आचार संहिता' (Code of Conduct) जारी करने पर विचार कर रहा है, ताकि भविष्य में इस तरह के टकराव को टाला जा सके।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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