सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आपराधिक मुकदमों के दौरान थानों या परिसरों में खड़े वाहनों को अब मालिकों को सौंपा जाएगा
अदालत ने कहा कि थानों में खड़े रहने से वाहन और व्यावसायिक गाड़ियां खराब होती हैं और उनकी कमाई रुकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि आपराधिक मामलों में जब्त वाहन थानों में सड़ने के बजाय शर्तों पर मालिकों को मिलने चाहिए। अदालत ने गुजरात के एक शराब जब्ती मामले में यह व्यवस्था दी है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह नियम तय किया है कि पुलिस द्वारा जब्त किए गए वाहन किसी भी आपराधिक मुकदमे के लंबित रहने के दौरान अनिश्चित काल तक थाने या परिसरों की कस्टडी में खड़े नहीं रहने चाहिए। अदालत की इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वाहन मालिक अपनी संपत्ति को थानों में सड़ने और खराब होने देने के बजाय अपने इस्तेमाल के लिए वापस पा सकें। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाया है।
वाहन और संपत्ति के नुकसान पर अदालत की टिप्पणी
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने यह गौर किया कि व्यावसायिक वाहन जब बेकार खड़े रहते हैं, तो उनकी कीमत में भारी गिरावट आ जाती है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, मौसम की मार के कारण गाड़ियों में जंग लग जाती है, जबकि उनके पार्ट्स और सील लगातार इस्तेमाल न होने की वजह से खराब हो जाते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गाड़ी के हर एक दिन तक एक ही जगह खड़े रहने से उसके मालिक की कमाई की क्षमता पूरी तरह खत्म हो जाती है।
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प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस ने एक अशोक Leyland ट्रक को जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर RJ-14-GQ-22692 है, 4-5 जनवरी 2025 की रात को पकड़ा था। यह वाहन मोडासा से लुणावाडा के रास्ते वडोदरा की ओर जा रहा था, तभी इसे बीच रास्ते में रोककर जब्त कर लिया गया। अभियोजन पक्ष की रिपोर्टों के अनुसार, चालक के पास ट्रक में अन्य सामान के बीच छिपी हुई 8,064 भारतीय निर्मित विदेशी शराब की बोतलों के लिए कोई पास नहीं था। पकड़ी गई इन शराब की बोतलों की कुल कीमत 17,02,656 रुपये थी, जबकि ट्रक में लदे हुए खाद्य परिवहन सामान की कीमत 98,66,552 रुपये थी।
इस मामले में 5 जनवरी 2025 को लुणावाडा पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। न्यायलय के फैसले के विवरण के अनुसार, इस मामले में चार आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ 1 मार्च 2025 को एक चार्जशीट दाखिल की गई थी। इसके बाद ट्रक के मालिक ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 497 के तहत वाहन की अंतरिम कस्टडी यानी अस्थायी कब्जे की मांग की थी।
निचली अदालतों से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
लुणावाडा के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 22 मई 2025 को वाहन की कस्टडी के इस अनुरोध को खारिज कर दिया था। इसके बाद एक सत्र न्यायाधीश ने 7 अगस्त 2025 को उस फैसले को बरकरार रखा। बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने भी 9 सितंबर 2025 को वाहन मालिक की याचिका को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान मालिक ने यह दलील दी थी कि उनका ट्रक एक व्यावसायिक संपत्ति है और वाहन का मालिक कथित अपराध में किसी भी तरह से शामिल नहीं था।
अस्थायी रिहाई के लिए मानने होंगे ये सख्त नियम
अदालत ने यह आदेश दिया है कि वाहन की रिहाई साक्ष्यों की सुरक्षा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए कड़ी शर्तों के अधीन होगी। इसके लिए ट्रक मालिक को कुछ विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करना होगा। मालिक को 15 लाख रुपये की सुरक्षा के साथ एक निजी मुचलका भरना होगा। इसके अलावा जब भी जांच अधिकारी या ट्रायल कोर्ट निर्देश देगा, तब उस ट्रक को अदालत के सामने पेश करना होगा। मालिक वाहन को बेच नहीं पाएगा और न ही उसमें किसी तीसरे पक्ष के हित का सृजन कर सकेगा। साथ ही, वाहन की रिहाई से पहले जांच अधिकारी को एक विस्तृत पंचनामा तैयार करने, तस्वीरें खींचने और वीडियो बनाने की पूरी अनुमति देनी होगी।
गुजरात कानून की धारा 98(2) पर अदालत की व्याख्या
गुजरात के अधिकारियों ने ट्रक की रिहाई का विरोध करने के लिए गुजरात निषेध अधिनियम, 1949 की धारा 98(2) का हवाला दिया था। इस प्रावधान का यह सुझाव है कि यदि जब्त की गई शराब की मात्रा एक विशिष्ट सीमा से अधिक है, तो अंतिम फैसले तक वाहनों को वापस नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इससे अंतरिम कस्टडी पर पूरी तरह से रोक नहीं लग जाती है। वर्ष 2024 के अपने फैसले 'खेरंगभाई लाखाभाई डंभाला बनाम गुजरात राज्य' मामले का हवाला देते हुए, बेंच ने अंतिम जब्ती और अस्थायी संरक्षण के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस ruling से धारा 98(2) अमान्य नहीं होती है। यह केवल कस्टडी से इनकार करने के लिए कानून के स्वतः उपयोग को खारिज करती है। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में बुनियादी अभियोजन की कार्रवाई सामान्य रूप से जारी रहेगी, क्योंकि इन टिप्पणियों का आपराधिक मुकदमे के गुणों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। यदि अंततः ट्रक को जब्त कर लिया जाता है, तो ट्रायल कोर्ट अभी भी सुरक्षा के खिलाफ आगे बढ़ सकता है या नीलामी के लिए आदेश पारित कर सकता है। आपराधिक मामले की कार्यवाही अपनी सामान्य प्रक्रिया के अनुसार ही चलती रहेगी।
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