आध्यात्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि प्रभु कृपा की प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग करना और समर्पण का भाव अपनाना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि अहंकार के कारण व्यक्ति और परमात्मा के बीच का सम्बन्ध बाधित होता है।
समर्पित व्यक्ति शून्यता के अनुभव में डूबा होता है। उसमें किसी प्रकार की प्रत्याशा, आकांक्षा या कामना नहीं रहती। यह स्थिति परमात्मा की शक्तियों के लिए कोई अवरोध उत्पन्न नहीं करती और व्यक्ति को पूर्ण रूप से ईश्वर की इच्छा के अनुरूप बनने का अवसर देती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि श्रद्धा समर्पण का आधार है। आध्यात्मिक क्षेत्र में संशय व्यक्ति को परमात्मा से दूर ले जाता है। जबकि भौतिक क्षेत्र में संशय कभी-कभी उपलब्धियों का माध्यम बन सकता है, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह खतरनाक है।
जो लोग अपने जीवन में परमात्मा की ज्ञान वीणा बने रहते हैं, उनका जीवन सफल और धन्य माना जाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर स्थिरता पाने के लिए अहंकार का विसर्जन और श्रद्धा का विकास अनिवार्य है।
समर्पण और श्रद्धा को जीवन में अपनाकर व्यक्ति न केवल अपने भीतर शांति का अनुभव करता है, बल्कि ईश्वर की कृपा का अनुभव भी करता है।

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