पूजा-पाठ सिर्फ औपचारिकता न बने: आत्मनिरीक्षण से करें वास्तविक आध्यात्मिक लाभ
मनुष्य अपनी आस्था के अनुसार पूजा गृहों में जाता है और परमात्मा की स्तुति करता है। स्तुति का वास्तविक अर्थ परमात्मा के गुणों का स्मरण करना होता है लेकिन वर्तमान समय में इस भक्ति का कोई विशेष लाभ साधक को मिलता नहीं दिख रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पूजा की जिस विधि को अपनाया जा रहा है भक्त न तो उसका भाव समझते हैं और न ही उसे अपने व्यवहार या आचरण में उतारते हैं। जब तक मंत्रों और प्रार्थनाओं का प्रभाव व्यक्ति के चरित्र में नहीं झलकता तब तक पूजा पाठ मात्र एक दिखावा बनकर रह जाता है।
परमात्मा की स्तुति के दौरान प्रभु को दयालु कहना तभी सार्थक है जब हमारे भीतर भी दीन हीन के प्रति दयालुता का भाव जाग्रत हो। अक्सर देखा जाता है कि हम प्रभु को दाता और दानी कहकर पुकारते हैं लेकिन स्वयं दाता नहीं बन पाते। सच्चा दानी वही है जो देकर बदले में कुछ पाने की अपेक्षा न रखे जबकि आज का इंसान बिना स्वार्थ के किसी की सहायता करने को तैयार नहीं है। परमात्मा सर्वशक्तिमान है और वह किसी के सहारे के बिना कार्य करता है लेकिन हम अपनी छोटी छोटी जरूरतों के लिए भी दूसरों पर आश्रित रहते हैं।
आत्म निरीक्षण की प्रक्रिया में यह देखना अनिवार्य है कि क्या हम प्रभु की तरह निश्छल निर्मल और निर्विकार बनने का प्रयास कर रहे हैं। यदि हम स्वयं को विकारों से बचाने और दूसरों के साथ छल न करने का संकल्प नहीं लेते तो हमारी धार्मिक क्रियाएं निष्फल हैं। आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्वयं को निर्मल रखना और आचरण में शुद्धता लाना अनिवार्य है। यदि विश्लेषण करने पर हम इन नैतिक पैमानों पर खरे नहीं उतरते तो यह स्पष्ट है कि हम केवल औपचारिकता निभा रहे हैं जिसका आध्यात्मिक या व्यावहारिक जीवन में कोई लाभ मिलने वाला नहीं है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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