मनुष्य की अज्ञानता: अंधविश्वास और बलि से बढ़ते पाप
आज के आधुनिक युग में भी मनुष्य की वैचारिक अज्ञानता और कट्टरता समाज के लिए एक गंभीर प्रश्नचिह्न बनी हुई है। धर्म के नाम पर फैले पाखंड और संकीर्ण मानसिकता ने इंसान को इस कदर अंधा कर दिया है कि वह निर्जीव मूर्तियों को प्रसन्न करने के लिए बेजुबान और जीवित पशुओं की बलि चढ़ाने से भी पीछे नहीं हट रहा है। लोग ईश्वरीय आशीर्वाद पाने की लालसा में निरीह प्राणियों का रक्त बहा रहे हैं, जबकि सत्य तो यह है कि इस प्रकार के दुष्कर्मों से मनुष्य अपने पापों का बोझ कम करने के बजाय उनमें निरंतर वृद्धि ही कर रहा है।
सृष्टि के नियमों और आध्यात्मिक दर्शन के अनुसार संसार के समस्त जीवों को एक ही परमपिता परमात्मा की संतान माना गया है। ऐसे में यह विचार करना अनिवार्य है कि भला एक पिता अपनी एक संतान की बलि से दूसरी संतान को आशीर्वाद कैसे दे सकता है। यदि एक ही माता-पिता की एक संतान दूसरी की हत्या कर दे, तो क्या वह माता-पिता उस हत्यारी संतान से कभी प्रसन्न हो सकते हैं। इसका उत्तर निश्चित ही नकारात्मक है। प्रभु ने हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी को एक समान बनाया है और उनका दिव्य प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर समान रूप से व्याप्त है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि एक धर्म का अनुयायी दूसरे धर्म के लोगों को छोटा या अज्ञानी मानकर हीन भावना से देखता है।
समाज के बुद्धिजीवियों और संतों का सदैव यह मत रहा है कि मनुष्य का शरीर ही परमात्मा का सच्चा मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारा है। प्रभु का वास्तविक निवास इन हाड़-मांस के जीवित शरीरों में है, न कि केवल ईंट और पत्थरों से बनी इमारतों में। अत्यंत दुख का विषय है कि मनुष्य द्वारा निर्मित इन निर्जीव पूजा स्थलों के नाम पर होने वाले झगड़ों में उलझकर लोग ईश्वर द्वारा सृजित सजीव मंदिरों यानी इंसानों को मौत के घाट उतारने में जरा भी संकोच नहीं करते। हजारों की संख्या में इंसानी जान लेना आज धर्म और स्वर्ग प्राप्ति का साधन माना जाने लगा है, जो वास्तव में अधर्म की पराकाष्ठा है। जब तक मनुष्य इस अज्ञानता को त्याग कर इंसानियत को सर्वोपरि नहीं मानेगा, तब तक शांति और ईश्वर की प्राप्ति असंभव है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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