आत्मावलोकन, सद्गुण और अहंकार: व्यक्तित्व विकास का मार्ग
हम अक्सर अपने जीवन में सही और गलत का भान खो देते हैं। इस संदर्भ में यह आवश्यक है कि हम अपने विचारों, इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं का गहन विश्लेषण करें। हमें समझना चाहिए कि ये हमारी गतिविधियों और व्यवहार के माध्यम से हमारे तथा अन्य लोगों पर किस प्रकार का प्रभाव डालते हैं। किसी भी कार्य या निर्णय से किसी का अहित नहीं होना चाहिए।
अकसर लोग अपने अनुभवों और ज्ञान के आधार पर मिथ्यामिभान के शिकार हो जाते हैं। मन, हृदय और आत्मा ही हमारी जीवन शक्ति का स्रोत हैं। परमात्मा द्वारा प्रदत्त इन शक्तियों को हमें वरदान स्वरूप स्वीकार करना चाहिए। लेकिन जब हम इन्हें स्वयं उत्पन्न करने का श्रेय लेने लगते हैं, तब अहंकार हमारी समझ और दृष्टिकोण को प्रभावित करने लगता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मन सोचता है और हृदय एवं आत्मा तदनुरूप स्वीकार करती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ दिव्य शक्तियों में ह्रास आरंभ होता है और यह प्रक्रिया अंततः व्यक्ति के विनाश का कारण बन सकती है। इसलिए आत्मविश्लेषण और अहंकार से दूर रहने की आदत जीवन में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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