नव संवत्सर का संकल्प: ईश्वरीय समष्टि और पर्यावरण संरक्षण के साथ राष्ट्र उन्नति का आह्वान

भारतीय नव संवत्सर की पावन बेला पर मानवता और प्रकृति के प्रति अटूट प्रेम का संदेश देते हुए प्रबुद्ध जनों ने समाज को एकजुट होने का आह्वान किया है। इस अवसर पर यह विचार साझा किया गया कि ईश्वर की संपूर्ण सृष्टि किसी विशिष्ट व्यक्ति या वर्ग के लिए नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों और पूरी समष्टि के लिए है। परमात्मा स्वयं किसी जीव से भेदभाव नहीं करता और न ही वह अपने बनाए प्राणियों से ऐसी अपेक्षा रखता है। ईश्वरीय सत्ता का मूल आधार प्रेम और सद्भाव है, जो जड़ और चेतन जगत के निरंतर परिवर्तन में भी झलकता है।
प्रकृति का उपहार सबके लिए समान
सृष्टि के चक्र और ऋतु परिवर्तन के माध्यम से ईश्वर बिना किसी पक्षपात के सभी जीवों का पोषण करता है। दिन-रात की अवधि में घटत-बढ़त और मौसम का बदलाव प्रभु की अनमोल देन है, जिसका लाभ हर प्राणी समान रूप से उठाता है। कड़ाके की ठंड में सूर्य की तपिश और भीषण गर्मी में वृक्षों की शीतल छाया ईश्वरीय वात्सल्य का ही रूप है। जब प्रकृति सूर्य की रोशनी और वायु देने में कोई भेदभाव नहीं करती, तो मानव जाति के बीच विरोध और संघर्ष का कोई औचित्य नहीं रह जाता। सभी जीव उस एक परमपिता की संतान हैं, इस नाते आपसी शत्रुता का त्याग कर भाईचारे का मार्ग अपनाना ही धर्म है।
प्रदूषण मुक्त सृष्टि का लें संकल्प
नव संवत्सर की इस शुभ प्रभात बेला में यह संकल्प लेना अनिवार्य है कि हम प्रभु की इस सुंदर सृष्टि की मौलिकता को विकृत नहीं करेंगे। वर्तमान समय की चुनौतियों को देखते हुए पर्यावरण की सुरक्षा और प्रदूषण से मुक्ति को प्राथमिकता देना समय की मांग है। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारी सजगता ही आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकती है। आपसी सौहार्द बनाए रखते हुए हम न केवल अपने सौभाग्य में वृद्धि कर सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ समाज का निर्माण भी कर सकते हैं।
राष्ट्र उन्नति की कामना
संवाद के अंत में राष्ट्र प्रेम की भावना को सर्वोपरि रखते हुए कहा गया कि जिस मिट्टी में हम पलते हैं और जिस राष्ट्र के अन्न-जल से हमारा पोषण होता है, उसकी उन्नति ही हमारा परम लक्ष्य होना चाहिए। आपसी मतभेदों को भुलाकर जब हम एक सूत्र में बंधेंगे, तभी हमारा राष्ट्र दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा। नव संवत्सर के इस मांगलिक अवसर पर समस्त देशवासियों को सुख, समृद्धि और आरोग्य की शुभकामनाएं देते हुए राष्ट्र की अखंडता और विकास के लिए समर्पित होने की अपील की गई है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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