निष्काम भक्ति ही सच्ची भक्ति: संतों का संदेश

संसार के समस्त संतों और मनीषियों ने सदैव इस सत्य पर बल दिया है कि मानव जीवन का परम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है। विडंबना यह है कि मनुष्य इस उद्देश्य को विस्मृत कर सांसारिक भोगों और क्षणभंगुर विषय-विकारों में पूरी तरह लिप्त हो चुका है। उसका ध्यान ईश्वर की भक्ति की ओर तभी जाता है, जब उसे अपनी किसी सांसारिक इच्छा की पूर्ति करनी होती है।
अज्ञानता वश मनुष्य सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए की गई प्रार्थना को ही सच्ची भक्ति मान बैठता है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। अध्यात्म की दृष्टि में किसी विशेष फल या इच्छा की पूर्ति के लिए की गई भक्ति, 'भक्ति' नहीं अपितु एक प्रकार का 'व्यापार' है। सच्चा भक्त वही है जो परमपिता परमात्मा के प्रति पूर्णतः समर्पित हो और उसकी भक्ति किसी स्वार्थ से नहीं, बल्कि प्रेम और निष्काम भाव से प्रेरित हो।
मनुष्य को यह समझना होगा कि वह अपनी चालाकी से संसार और स्वयं को तो भ्रम में रख सकता है, परंतु सर्वव्यापी परमात्मा को धोखा देना असंभव है। दूसरों के साथ किया गया छल अंततः स्वयं के लिए ही संकट का कारण बनता है। अतः वास्तविक शांति और ईश्वरीय कृपा के लिए कामनाओं का त्याग कर निस्वार्थ भाव से समर्पण करना ही श्रेयस्कर है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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