अच्छाई जानना ही नहीं, उसे जीवन में उतारना ही सच्ची मानवता

आज के दौर में अच्छाई की जानकारी होना और उसे अपने जीवन में अमल में लाना, ये दो बिल्कुल अलग बातें बनकर रह गई हैं। समाज में क्या सही है और क्या गलत, इसका बोध लगभग हर व्यक्ति को है, लेकिन विडंबना यह है कि उन अच्छे कार्यों और आदर्शों के प्रति समर्पित होने वालों की संख्या लगातार घटती जा रही है। वास्तव में मानव बनने की पहली सीढ़ी अपने स्वयं के आचरण को परिष्कृत करना और भीतर की बुराइयों का स्वेच्छा से त्याग करना है। जब तक मनुष्य अपने व्यवहार में सुधार नहीं लाता, तब तक श्रेष्ठता की बातें केवल किताबी आदर्श बनकर रह जाती हैं।
हमारी अज्ञानता ही वर्तमान समय में हमारा सबसे बड़ा शत्रु सिद्ध हो रही है। यही वह अंधकार है जो एक इंसान को दूसरे इंसान से दूर कर देता है और दिलों में दूरियां पैदा करता है। समाज में बदलाव का सबसे प्रभावी तरीका स्वयं में सुधार करना है। जब हम स्वयं को सुधार लेते हैं, तभी हमें यह अधिकार मिलता है कि हम अपने आसपास के लोगों से यह अपेक्षा करें कि वे भी पूरी ईमानदारी से नैतिकता और मानवीय मूल्यों का पालन करें। दूसरों को अच्छाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने का सबसे सशक्त माध्यम हमारा अपना उदाहरण और आचरण ही हो सकता है।
आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में अधिकांश लोग यह तर्क देते हुए पाए जाते हैं कि यदि जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त करनी है या प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचना है, तो नैतिकता और मानवीय मूल्यों को नजरअंदाज करना ही होगा। समाज का एक बड़ा वर्ग इस भ्रम में जी रहा है कि ईमानदारी के रास्ते पर चलकर तरक्की संभव नहीं है। विशेषज्ञों और विचारकों का मानना है कि यह तर्क पूरी तरह से आधारहीन है। अनैतिकता के मार्ग पर चलकर प्राप्त की गई सफलता मनुष्य को केवल अंधकार की ओर धकेलती है। संस्कारों के अभाव में आज का इंसान भीड़ में अपनी असली पहचान खोता जा रहा है।
आधुनिकता की अंधी दौड़ और भौतिकवादी सोच ने मानवता की परिभाषा को बेहद जटिल और संकुचित बना दिया है। जीवन का वास्तविक अर्थ केवल स्वयं की जरूरतों और इच्छाओं तक सीमित रहना कतई नहीं है। मानव जीवन की असली उपयोगिता और सार्थकता इसी में निहित है कि हम अपने सामर्थ्य के अनुसार मानवता की कितनी सेवा कर पाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी देखें तो यह शरीर और इसके द्वारा की गई सेवा ही वह एकमात्र पूँजी है जो परलोक में मनुष्य के साथ जाती है। दुनिया में एकत्रित किए गए भौतिक पदार्थ, अर्जित धन-दौलत और वैभव यहीं धरा रह जाता है, साथ केवल वह नेकियाँ जाती हैं जो हमने निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए की होती हैं।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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