शरीर में दो निवास: जीवात्मा और परमात्मा – कर्म और ईश्वर की दृष्टि

मानव शरीर एक ऐसा अनूठा स्थान है जहाँ जीवात्मा और परमात्मा दोनों का निवास होता है। ईश्वर इस काया का सृजनकर्ता और रक्षक है जो इसके अंगों को बड़ी सूक्ष्मता से बनाता है लेकिन स्वयं उन अंगों का उपयोग नहीं करता। जैसे एक शिल्पी भवन बनाता है परंतु उसमें रहता नहीं ठीक उसी प्रकार ईश्वर ने हमारे लिए मस्तिष्क का निर्माण किया ताकि हम विचार कर सकें और आंखों की रचना की ताकि हम संसार को देख सकें।
सृष्टि की इस व्यवस्था में सूर्य का प्रकाश हो या कानों की सुनने की शक्ति यह सब मनुष्य के लाभ के लिए ही निर्मित किए गए हैं। ईश्वर इन संसाधनों का उपभोग नहीं करता बल्कि वह केवल यह अपेक्षा रखता है कि जीवात्मा इन दिव्य उपहारों का सदुपयोग करे। विडंबना यह है कि मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति की अंधी दौड़ में इतना कृतघ्न हो जाता है कि वह इन अंगों का उपयोग पाप कार्यों और दूसरों को कष्ट पहुँचाने में करने लगता है।
कर्म और भोग का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि परमात्मा न तो कर्म करता है और न ही उसके फल को भोगता है वह केवल एक साक्षी के रूप में इस शरीर का संचालन करता है। खट्टे और मीठे का स्वाद चखने वाली रसना हो या कर्म करने वाले हाथ इनके द्वारा किए गए कार्यों का फल केवल जीवात्मा को ही भुगतना पड़ता है। यदि मनुष्य यह समझ ले कि उसकी इंद्रियां ईश्वर की दी हुई अमानत हैं तो वह मनमाने तरीके से कर्म करने के बजाय परोपकार और नैतिकता के मार्ग को चुन सकता है।
ईश्वर की सद्अपेक्षाओं पर खरा उतरने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम अच्छे और बुरे के भेद को समझें और जितना संभव हो सके दूसरों का भला करें। अंततः यह शरीर एक अवसर है जिसका उपयोग हमें आत्मिक उन्नति और सेवा के लिए करना चाहिए न कि केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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