जब घेर लें भीतर के शत्रु…
आदमी जब अपने भीतर बैठे काम क्रोधादि शत्रुओं के कारण जिन्दगी के चमन को अपनी आंखों के सामने उजड़ते हुए देखता है, तब वह कराह उठता है, चिल्ला पड़ता है। ‘मैं फूल चुनने आया था बागो हयात में, दामन को खार-जार में उलझाके रह गया।’ मित्रों उस समय आदमी की दशा बहुत खराब हो जाती […]
आदमी जब अपने भीतर बैठे काम क्रोधादि शत्रुओं के कारण जिन्दगी के चमन को अपनी आंखों के सामने उजड़ते हुए देखता है, तब वह कराह उठता है, चिल्ला पड़ता है।
‘मैं फूल चुनने आया था बागो हयात में, दामन को खार-जार में उलझाके रह गया।’ मित्रों उस समय आदमी की दशा बहुत खराब हो जाती है, जिस समय उसके भीतर के शत्रु मिलकर घेराबंदी करते हैं। आदमी चाहता है कि उपकार की राह पर चले, किन्तु इनके प्रभाव के कारण बुराई की राह पर खुलकर दौड़ने लगता है। आदमी चाहता तो है वह जीवन के उपवन में मानवता के फूलों के खिलने का अवसर दें, परन्तु इन भीतर के शत्रुओं के कारण जीवन उपवन के हर कण पर कांटे उग आते हैं। वह इन कांटों को उगते देखकर परेशान हो जाता है, परन्तु तब वह अपनी विवशताओं के कारण कहने को बाध्य हो जाता है।
‘चाहा था किसी दीप को बुझने से बचा लूं, किन्तु मेरे हाथ से खुद दीप बुझ गये, आंसू किसी के पोंछने की बात तो दूर, खिल रहे फूल मसल गए।’
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