जब घेर लें भीतर के शत्रु…
आदमी जब अपने भीतर बैठे काम क्रोधादि शत्रुओं के कारण जिन्दगी के चमन को अपनी आंखों के सामने उजड़ते हुए देखता है, तब वह कराह उठता है, चिल्ला पड़ता है। ‘मैं फूल चुनने आया था बागो हयात में, दामन को खार-जार में उलझाके रह गया।’ मित्रों उस समय आदमी की दशा बहुत खराब हो जाती […]
आदमी जब अपने भीतर बैठे काम क्रोधादि शत्रुओं के कारण जिन्दगी के चमन को अपनी आंखों के सामने उजड़ते हुए देखता है, तब वह कराह उठता है, चिल्ला पड़ता है।
‘चाहा था किसी दीप को बुझने से बचा लूं, किन्तु मेरे हाथ से खुद दीप बुझ गये, आंसू किसी के पोंछने की बात तो दूर, खिल रहे फूल मसल गए।’
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लेखक के बारे में
रॉयल बुलेटिन के संस्थापक एवं मुख्य संपादक अनिल रॉयल ने वर्ष 1985 में मात्र 17 वर्ष की आयु से मुज़फ्फरनगर की पावन भूमि से निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता का संकल्प लिया। बीते लगभग चार दशकों से वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सशक्त और विश्वसनीय आवाज़ के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
पत्रकारिता के अपने लंबे अनुभव के आधार पर उन्होंने वर्ष 2010 में नोएडा से रॉयल बुलेटिन के प्रिंट संस्करण का सफल विस्तार किया। समय के साथ बदलते मीडिया परिदृश्य को समझते हुए, उनके नेतृत्व में यह संस्थान आज एक मजबूत और प्रभावशाली डिजिटल समाचार मंच के रूप में स्थापित हो चुका है।
वर्तमान में रॉयल बुलेटिन की पहुँच न्यूज़ पोर्टल, फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप सहित सभी प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर करोड़ों पाठकों तक है। प्रिंट और डिजिटल मीडिया के स्वामी एवं संपादक के रूप में अनुभव, सत्यनिष्ठा और जन-सरोकार उनकी पत्रकारिता की मूल आधारशिला रहे हैं।

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