यजुर्वेद 40वाँ अध्याय, प्रथम मंत्र: अहंकार और ईर्ष्या से मुक्त होकर सम्मान और प्रेम का मार्ग

भागदौड़ भरी इस दुनिया में मनुष्य अक्सर अपनी उपलब्धियों को अपने पुरुषार्थ का परिणाम मानकर अहंकार के वश में हो जाता है। लेकिन भारतीय मनीषियों और वेदों ने हजारों वर्ष पूर्व ही स्पष्ट कर दिया था कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी दृश्यमान है, वह सब ईश्वर की ही कृति है। यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का प्रथम मंत्र— 'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्'—हमें इसी परम सत्य का बोध कराता है।
इस मंत्र का सरल अर्थ यही है कि संसार में जो कुछ भी है, वह ईश्वर का है और उसी के द्वारा प्रदत्त है। जब सब कुछ ईश्वर की कृपा से प्राप्त है, तो उसे 'अपना' मानना या स्वयं को उसका कर्ता समझना केवल अज्ञानता और अहंकार है।
तुलना से पनपता है अहंकार और ईष्र्या
आज के दौर में मानसिक अशांति का सबसे बड़ा कारण दूसरों से स्वयं की तुलना करना है। लेख के अनुसार, यदि आप अपनी तुलना दूसरों के साथ करते हैं, तो आप अनिवार्य रूप से अहंकार या ईष्र्या के शिकार हो जाते हैं। व्यक्ति को चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार दूसरों की सच्ची प्रशंसा करे, लेकिन चापलूसी से कोसों दूर रहे। झूठी प्रशंसा या चापलूसी इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति स्वयं को हीन या कमजोर समझता है अथवा वह किसी स्वार्थ के वशीभूत है।
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समाज निर्माण का मूल मंत्र संवेदनशीलता है। जो लोग दूसरों का अहित करने की योजना बनाते हैं, वे अंततः अपना भी भला नहीं कर पाते। सम्मान के बदले ही सम्मान मिलता है; जो दूसरों का आदर करना नहीं जानते, उन्हें समाज में कभी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होती। यदि हम दूसरों के प्रति प्रेम और सम्मान का व्यवहार अपना लें, तो समाज से घृणा का स्वतः ही अंत हो जाएगा।
वाणी का संयम ही बुद्धि की पहचान
वर्तमान में अपशब्दों का प्रयोग एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। कड़वे और अभद्र शब्दों का चयन वास्तव में व्यक्ति की बौद्धिक शून्यता को दर्शाता है। अपशब्द बोलने का अर्थ है कि व्यक्ति में इतनी भी समझ नहीं कि वह उचित और मर्यादित शब्दों का चुनाव कर सके। एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए वाणी का संयम और दूसरों के प्रति संवेदना अनिवार्य है।
निष्कर्ष:
यजुर्वेद का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था। अहंकार का त्याग, चापलूसी से दूरी और परोपकार की भावना ही मानव जीवन को सार्थक बना सकती है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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