5 साल के बच्चे की कुत्ते के काटने से मौत..3 एंटी-रेबीज वैक्सीन लगने के बाद भी नहीं बची जान
आगरा। आगरा के पिनाहट इलाके से आई यह खबर न केवल दुखद है, बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाली है। 5 साल के मासूम निखिल की मौत ने एक बार फिर रेबीज (Rabies) के इलाज और वैक्सीनेशन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आगरा की घटना: क्या हुआ था?
रिपोर्ट्स के अनुसार, आगरा के पिनाहट निवासी 5 साल के निखिल को करीब 15 दिन पहले एक पागल कुत्ते ने काट लिया था।परिजनों ने बच्चे को सरकारी अस्पताल में 3 वैक्सीन (डोज) भी लगवाईं। लेकिन तीसरे डोज के बाद बच्चे की हालत अचानक बिगड़ने लगी। बच्चे को पानी से डर लगने लगा (Hydrophobia) और वह रोशनी से दूर भागने लगा। बताया जा रहा है कि अंत समय में उसकी हरकतें और आवाजें कुत्तों जैसी हो गई थीं, जो रेबीज के एडवांस स्टेज का लक्षण है।परिजन उसे आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज ले गए और फिर दिल्ली ले जाने की कोशिश की, लेकिन रास्ते में ही मासूम ने दम तोड़ दिया।
वैक्सीन के बाद भी मौत क्यों? (विशेषज्ञों की राय)
आम जनता के मन में यह सवाल है कि 'अगर टीका लग गया था, तो मौत क्यों हुई?' इसके पीछे कुछ तकनीकी और चिकित्सीय कारण हो सकते हैं।
अगर कुत्ता पागल था और उसने बच्चे के चेहरे, गर्दन या हाथों पर गहरा काटा था, तो वायरस बहुत तेजी से नसों के जरिए दिमाग तक पहुँच जाता है। ऐसे मामलों में केवल वैक्सीन काफी नहीं होती।गहरे घाव के मामलों में Serum (Immunoglobulin) का इंजेक्शन सीधे घाव के अंदर लगाना अनिवार्य होता है। यह वायरस को तुरंत खत्म करता है, जबकि वैक्सीन को असर करने में 10-14 दिन लगते हैं। आगरा के मामले में शायद यह सीरम नहीं दिया गया।यदि काटने के तुरंत बाद घाव को 15 मिनट तक साबुन और पानी से नहीं धोया गया, तो वायरस की मात्रा शरीर में बहुत बढ़ जाती है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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