"क्या दलितों-पिछड़ों का उत्पीड़न करना सवर्णों का अधिकार है?"— यूजीसी नियमों के विरोध पर भड़के स्वामी प्रसाद मौर्य
लखनऊ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से लागू किए गए 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026' पर विवाद बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में पूर्व मंत्री और अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने तीखा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इस कानून से जनरल कैटेगरी को आखिर किस बात का खतरा है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या सवर्ण समाज यह मानता है कि एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों पर अत्याचार करना उनका अधिकार है या फिर वे यह सोचते हैं कि दूसरों के अधिकार छीनना उनका स्वाभाविक अधिकार है।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने स्पष्ट कहा कि इस कानून से सवर्ण समाज का न तो कोई नुकसान है और न ही किसी प्रकार का खतरा, बल्कि यह कानून केवल उत्पीड़न के शिकार वर्गों को संरक्षण देने के उद्देश्य से लाया गया है, इसलिए इसका सभी को मिलकर स्वागत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सवर्ण समाज के कुछ लोग इस कानून का विरोध करने पर आमादा हैं, तो इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि तथाकथित मुट्ठीभर लोग आज भी देश की 90 प्रतिशत दलित और आदिवासी आबादी को हिंदू नहीं मानते। यदि वे वास्तव में उन्हें हिंदू मानते, तो शायद इस तरह का विरोध सामने नहीं आता। स्वामी प्रसाद मौर्य ने इसे सामाजिक समानता और समरसता के खिलाफ मानसिकता करार दिया। यूजीसी लॉ 2026 को लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि यह कानून पूरी तरह भारतीय संविधान के अनुरूप है और संविधान की मूल भावना को स्पष्ट रूप से लागू करता है। संविधान के अनुसार किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, संप्रदाय, जाति, लिंग या स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता और यही सिद्धांत इस कानून के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और रीडर जैसे पदों पर नियुक्तियों में जातिगत भेदभाव खुले तौर पर देखने को मिलता है। एससी, एसटी और ओबीसी के लिए निर्धारित आरक्षण व्यवस्था का मजाक उड़ाया जाता है और कई जगहों पर इसे लगभग शून्य कर दिया गया है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने आगे कहा कि केवल शिक्षकों की नियुक्ति ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्र-छात्राओं के साथ भी अक्सर अभद्र व्यवहार किया जाता है। ऐसे में इन सभी व्यवस्थाओं को सुचारू और न्यायसंगत बनाने के लिए यूजीसी लॉ 2026 जैसे कानून की आवश्यकता है, ताकि शिक्षा व्यवस्था में समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
इस दौरान संगम घाट पर अधिकारियों के साथ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य की हाथापाई और अभद्र व्यवहार के सवाल पर भी स्वामी प्रसाद मौर्य ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यदि शंकराचार्य की बेइज्जती हुई है तो यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि मौजूदा सरकार में अव्यवस्था फैली हुई है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज शंकराचार्य भी उसी अव्यवस्था का शिकार हो गए हैं और अब उन्हें यह एहसास हो रहा है कि किस तरह के लोग सत्ता में बैठे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य ने हाल ही में इटावा की घटना का भी जिक्र किया, जहां भागवत कथा कहने वाले यादव बंधुओं के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया गया और उनके सिर के बाल मुड़वा दिए गए तथा चोटी उखाड़ दी गई। उन्होंने कहा कि जब इस तरह की घटनाएं हो रही हैं तो शंकराचार्य के साथ अभद्र व्यवहार होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, बल्कि यह मौजूदा हालात की सच्चाई को उजागर करता है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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