संपादकीय: 'बटेंगे तो कटेंगे' का नारा और संतों पर लाठियां – क्या अब अफसर तय करेंगे भगवे की मर्यादा ?
उत्तर प्रदेश की सत्ता के शिखर पर आज एक ऐसे व्यक्तित्व आसीन हैं, जो स्वयं एक 'योगी' हैं और भगवा जिनके जीवन का संकल्प है। प्रदेश के ऊंचे मंचों से बार-बार हुंकार भरी जाती है— "एक रहोगे तो नेक रहोगे" और "बटोगे तो कटोगे"। लेकिन क्या ये नारे केवल चुनावी रैलियों के लिए हैं? क्योंकि प्रयागराज की पावन रेती पर जो दृश्य दिखाई दिए, वे इन नारों की धज्जियां उड़ाते हुए एक खौफनाक और विरोधाभासी तस्वीर पेश करते हैं।
क्या 'एसी' कमरों में बैठे अफसर तय करेंगे सनातन की मर्यादा ?
जिस देश की मिट्टी शास्त्रार्थ की साक्षी रही हो, वहां एक 'कानूनगो' या 'मेला अधिकारी' 24 घंटे का नोटिस देकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से उनकी पदवी का प्रमाण मांग रहा है। यह न केवल हास्यास्पद है, बल्कि पूरी सनातनी परंपरा का घोर अपमान है।
दोहरा मापदंड: काशी से प्रयागराज तक सवालों के घेरे में सत्ता
एक तरफ सरकार सनातन धर्म के पुनरुत्थान का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ उसी के मातहत अफसर संतों को 'नोटिस' देकर उनकी धार्मिक पहचान को चुनौती दे रहे हैं।
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वाराणसी का घाव: काशी में विकास के नाम पर माता अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा को खंडित करने का मामला हो या विकास की अंधी दौड़ में मंदिर-मूर्तियों के साथ किया गया खिलवाड़—कोई भी जागरूक नागरिक और सनातनी इसे सही नहीं ठहरा सकता।
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प्रशासनिक विरोधाभास: यदि प्रशासन को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पदवी पर संदेह है, तो इसी प्रशासन ने कुंभ में उन्हें सर्वोच्च सम्मान क्यों दिया था ? क्या उस समय नियम अलग थे ?
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संत बनाम कथावाचक: आज के दौर में 'कथावाचकों' को संत बनाकर पलकों पर बिठाया जाता है और जो असली भगवाधारी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं, उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं। क्या यह 'भगवा' का अपमान नहीं है?
भगवा की शुचिता पर 'वर्दी' का प्रहार
मान लिया जाए कि पदवी का मामला न्यायालय में है, लेकिन क्या वे एक ब्राह्मण और संत नहीं हैं ? क्या वे एक भगवाधारी नहीं हैं ? क्या उत्तर प्रदेश में अब योगी जी के अलावा किसी का भी भगवा पहनना अपराध हो गया है कि आधी रात को संतों के शिविरों में दबिश दी जा रही है ? एक तरफ एकता का आह्वान और दूसरी तरफ संतों को फुटपाथ पर बैठने को मजबूर करना—यह तानाशाही सीधे तौर पर उस भगवा की तौहीन है, जिसे इस प्रदेश की सत्ता का प्रतीक माना जाता है।
योगी सरकार को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए कि क्या उनके अफसर अपनी मर्यादा भूल चुके हैं ? अफसरों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि वे 'सेवक' हैं, 'निर्णायक' नहीं। संतों पर बरसी लाठियां और थमाया गया नोटिस केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि पूरी सनातनी परंपरा का तिरस्कार है। यदि संतों का यह अपमान नहीं रुका, तो 'एकता' के सारे नारे खोखले साबित होंगे।
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