एक्सप्लेनर: आखिर क्यों फर्जीवाड़ा करने वालों की 'पहली पसंद' है अरुणाचल प्रदेश? समझिए ट्रकों के खेल का पूरा गणित
बुढ़ाना पुलिस के खुलासे के बाद बड़ा सवाल: सुदूर राज्यों के आरटीओ (RTO) से कैसे बन जाती हैं यूपी के ट्रकों की फर्जी आरसी?
मुजफ्फरनगर। बुढ़ाना पुलिस द्वारा पकड़े गए अंतर्राज्यीय ट्रक गिरोह ने एक बार फिर उस पुराने 'सिंडिकेट' की याद दिला दी है, जिसके तार पूर्वोत्तर राज्यों (North East States) से जुड़े होते हैं। अक्सर देखा जाता है कि चोरी या फाइनेंस के वाहनों का फर्जी रजिस्ट्रेशन अरुणाचल प्रदेश या नागालैंड जैसे राज्यों से कराया जाता है। इसके पीछे कई तकनीकी और भौगोलिक कारण हैं, जिन्हें अपराधी ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं।
1. भौतिक सत्यापन (Physical Verification) की चुनौती
2. डेटा सिंक्रोनाइजेशन में देरी
हालांकि अब 'वाहन' (VAHAN) पोर्टल के जरिए पूरा देश डिजिटल रूप से जुड़ा है, लेकिन पूर्वोत्तर के कई दुर्गम इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और पुराने रिकॉर्ड्स के डिजिटलीकरण में देरी का फायदा अपराधी उठाते हैं। जब तक यूपी पुलिस या बैंक को शक होता है और वे अरुणाचल प्रदेश से रिकॉर्ड मंगवाते हैं, तब तक अपराधी वाहन को कई हाथों में बेच चुके होते हैं।
3. 'नंबर प्लेट' बदलने की चाल
अपराधी अक्सर फाइनेंस वाले ट्रकों को सस्ते में खरीदते हैं। इसके बाद वे किसी पुराने या कबाड़ हो चुके ट्रक की आरसी का उपयोग करते हैं या अरुणाचल प्रदेश से 'नया रजिस्ट्रेशन' करा लेते हैं। इसके बाद ट्रक का नंबर बदलकर उसे नया हुलिया दे दिया जाता है। चूंकि ट्रक अंतर्राज्यीय परमिट पर चलते हैं, इसलिए सड़क पर पुलिस को एचपी (HP), एआर (AR) या एनएल (NL) नंबर के ट्रकों पर जल्दी शक नहीं होता।
4. टैक्स और एनओसी (NOC) का झमेला
अपराधी उन राज्यों को चुनते हैं जहां रोड टैक्स और अन्य औपचारिकताएं थोड़ी लचीली होती हैं। एक बार जब किसी दूसरे राज्य की आरसी बन जाती है, तो उसे 'ट्रांसफर' कराकर वापस स्थानीय नंबर लेना आसान हो जाता है। इसी प्रक्रिया के बीच में चोरी या फाइनेंस का असली रिकॉर्ड गायब कर दिया जाता है।
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