संसद में गूंजा LPG मुद्दा : 5 दिनों में एलपीजी उत्पादन 28 प्रतिशत बढ़ा, सिलेंडर डिलीवरी समय 2.5 दिन ही: हरदीप सिंह पुरी
नई दिल्ली। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरुवार को संसद में कहा कि पिछले पांच दिनों में रिफाइनरियों को दिए गए निर्देशों के बाद एलपीजी उत्पादन में 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। साथ ही अतिरिक्त एलपीजी की खरीद भी सक्रिय रूप से की जा रही है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह है कि देश के 33 करोड़ से अधिक परिवारों, खासकर गरीब और वंचित वर्ग की रसोई में गैस की कमी न हो। उन्होंने बताया कि घरेलू गैस की सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित है और सिलेंडर की डिलीवरी का समय पहले की तरह ही बना हुआ है। पुरी ने संसद को बताया कि घरेलू एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग से लेकर डिलीवरी तक का औसत समय अभी भी 2.5 दिन है, जो संकट से पहले भी इतना ही था।
ये भी पढ़ें होली के बाद कानपुर में रंगों का ऐतिहासिक गंगा मेला शुरू, गलियों में रंग और उल्लास का दिख रहा नजाराइसके अलावा, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों को प्राथमिकता के आधार पर बिना रुकावट गैस सप्लाई दी जा रही है। उन्होंने कहा कि कुछ जगहों से ऐसी जानकारी मिली है कि डिस्ट्रीब्यूटर और रिटेल स्तर पर गैस सिलेंडर जमा करने और घबराहट में ज्यादा बुकिंग करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। हालांकि यह स्थिति किसी वास्तविक सप्लाई की कमी के कारण नहीं, बल्कि लोगों की चिंता के कारण पैदा हुई है। पुरी ने आगे कहा कि सरकार डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (डीएसी) प्रणाली का विस्तार कर रही है। अभी यह करीब 50 प्रतिशत उपभोक्ताओं के लिए लागू है, जिसे बढ़ाकर 90 प्रतिशत तक किया जा रहा है। इस व्यवस्था में सिलेंडर की डिलीवरी तभी दर्ज होगी, जब उपभोक्ता अपने मोबाइल पर आए वन-टाइम कोड से इसकी पुष्टि करेगा, जिससे गैस की गलत तरीके से सप्लाई या हेरफेर को रोकना आसान होगा।
मांग को संतुलित रखने के लिए शहरी क्षेत्रों में गैस सिलेंडर की बुकिंग के बीच कम से कम 25 दिन का अंतर और ग्रामीण तथा दुर्गम क्षेत्रों में 45 दिन का अंतर तय किया गया है। मंत्री ने बताया कि तेल मार्केटिंग कंपनियों के फील्ड अधिकारी और एंटी-अडल्टरेशन सेल डिस्ट्रीब्यूटर स्तर पर निगरानी कर रहे हैं। इसके अलावा केंद्रीय गृह सचिव ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ बैठक कर राज्य प्रशासन को इस व्यवस्था के साथ जोड़ने पर चर्चा की है। पुरी ने कहा कि कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई को नियंत्रित करने का उद्देश्य काला बाजारी रोकना है, न कि होटल और रेस्टोरेंट उद्योग को नुकसान पहुंचाना। कमर्शियल एलपीजी पूरी तरह बाजार आधारित कीमत पर बिना सब्सिडी के बेची जाती है और इसके लिए कोई पंजीकरण या बुकिंग प्रणाली नहीं होती। उन्होंने कहा कि अगर कमर्शियल एलपीजी की बिक्री पूरी तरह खुली छोड़ दी जाती, तो काउंटर से खरीदे गए सिलेंडर अवैध बाजार में भेजे जा सकते थे, जिससे असली व्यावसायिक और घरेलू उपभोक्ताओं को नुकसान होता। इसलिए सरकार ने स्पष्ट प्राथमिकता और पारदर्शी आवंटन प्रणाली लागू की है।
इस व्यवस्था की निगरानी के लिए इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम के कार्यकारी निदेशकों की तीन सदस्यीय समिति 9 मार्च को बनाई गई थी। इस समिति ने देश भर में राज्य के नागरिक आपूर्ति विभागों और रेस्तरां संघों के साथ बैठकें आयोजित की हैं और ये बैठकें जारी हैं। समिति ने विभिन्न क्षेत्रों और सेक्टरों के आधार पर कमर्शियल एलपीजी की वास्तविक जरूरत का आकलन किया है। इसके तहत एक बड़े फैसले में आज से तेल कंपनियां औसत मासिक कमर्शियल एलपीजी मांग का 20 प्रतिशत हिस्सा आवंटित करेंगी, ताकि जमाखोरी और काला बाजारी न हो। पुरी ने कहा कि एलपीजी और गैस पर दबाव कम करने के लिए वैकल्पिक ईंधन विकल्पों को भी सक्रिय किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि हालिया 60 रुपए के समायोजन के बाद बिना सब्सिडी वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 913 रुपए है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से इसकी कीमत करीब 987 रुपए होनी चाहिए थी। वैश्विक कीमतों के अनुसार, प्रति सिलेंडर 134 रुपए की बढ़ोतरी की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने 74 रुपए खुद वहन किए। इसके कारण उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए अतिरिक्त खर्च प्रतिदिन 80 पैसे से भी कम बैठता है। पुरी ने बताया कि पड़ोसी देशों में एलपीजी की कीमतें भारत से ज्यादा हैं। पाकिस्तान में एलपीजी सिलेंडर करीब 1,046 रुपए, श्रीलंका में 1,242 रुपए और नेपाल में 1,208 रुपए के आसपास है। उन्होंने यह भी कहा कि तेल मार्केटिंग कंपनियों को 2024-25 में हुए करीब 40,000 करोड़ रुपए के नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने 30,000 करोड़ रुपए के मुआवजे को मंजूरी दी है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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