सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में सेवानिवृत्त जजों की एडहॉक नियुक्ति को दी मंजूरी..जानिए क्या है आर्टिकल 224A
नई दिल्ली। भारतीय न्यायपालिका में लंबित मामलों के भारी बोझ को कम करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक बड़ा कदम उठाया है। कॉलेजियम ने संविधान के अनुच्छेद 224A का उपयोग करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को एडहॉक (तदर्थ) जज के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट, जो देश का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय है, वहां लाखों मामले लंबित हैं। यह निर्णय इसी संकट को हल करने के लिए लिया गया है।
क्या है संविधान का अनुच्छेद 224A?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के लिए यह क्यों जरूरी है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट में जजों के स्वीकृत पदों और रिक्तियों के बीच का अंतर काफी अधिक है। आंकड़ों के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट में आपराधिक और दीवानी मामलों की संख्या देश में सबसे अधिक है। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के पास दशकों का अनुभव होता है। एडहॉक जज के रूप में वे जटिल और पुराने मामलों को कम समय में निपटा सकते हैं। जब तक नए जजों की स्थायी नियुक्तियां नहीं होतीं, तब तक यह व्यवस्था न्यायिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करती है।
कॉलेजियम का फैसला और शर्तें
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने यह मंजूरी कुछ विशेष मापदंडों के आधार पर दी है। आमतौर पर एडहॉक जजों की नियुक्ति 2 वर्ष के लिए की जाती है। केवल उन्हीं सेवानिवृत्त जजों को चुना गया है जिनका रिकॉर्ड बेदाग रहा है और जिनके पास लंबित मामलों को निपटाने की उच्च दर रही है।
अब इस प्रस्ताव को कानून मंत्रालय और राष्ट्रपति के पास अंतिम मुहर के लिए भेजा जाएगा। उम्मीद है कि अगले कुछ हफ्तों में ये एडहॉक जज कार्यभार संभाल लेंगे।
एडहॉक जज के रूप में जिन नामों को मंजूरी मिली है
1. न्यायमूर्ति मोहम्मद फ़ैज़ आलम ख़ान
2. न्यायमूर्ति मोहम्मद असलम
3. न्यायमूर्ति सैयद आफ़ताब हुसैन रिज़वी
4. न्यायमूर्ति रेनू अग्रवाल
5. न्यायमूर्ति ज्योत्सना शर्मा
यह प्रावधान बहुत कम इस्तेमाल होता रहा है। वर्ष 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए दिशा-निर्देश तय किए थे।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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