महाकाल मंदिर में हिंदू नववर्ष का भव्य उत्सव 2000 साल पुरानी परंपरा के तहत शिखर पर फहराया जाएगा ब्रह्म ध्वज
अगर आप आस्था और इतिहास से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी रखते हैं तो यह खबर आपके लिए बेहद खास है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में हर पर्व को बहुत श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जाता है। इसी कड़ी में हिंदू नववर्ष और गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर मंदिर में विशेष तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस शुभ दिन महाकाल मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज फहराया जाएगा जिसे शुभता नई शुरुआत और विजय का प्रतीक माना जाता है। मंदिर प्रशासन और श्रद्धालु मिलकर इस पवित्र परंपरा को उत्साह के साथ निभाने की तैयारी कर रहे हैं।
सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ी है 2000 साल पुरानी परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार उज्जैन की यह परंपरा लगभग दो हजार साल पुरानी मानी जाती है। बताया जाता है कि उज्जैन के महान शासक सम्राट विक्रमादित्य ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। वे हर वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्रह्म ध्वज का आरोहण करवाते थे। यह दिन हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है इसलिए इसे बेहद शुभ माना जाता था।
इतिहास में दर्ज जानकारी के अनुसार उस समय इस परंपरा को यादगार बनाने के लिए विशेष सिक्के भी जारी किए गए थे। इन दुर्लभ सिक्कों को उज्जैन के पास महिदपुर में स्थित अश्विनी शोध संस्थान में आज भी सुरक्षित रखा गया है। ये सिक्के उस समय की समृद्ध संस्कृति और धार्मिक परंपराओं की झलक दिखाते हैं।
ब्रह्म ध्वज का धार्मिक महत्व और संदेश
महाकाल मंदिर के शिखर पर चढ़ाया जाने वाला ब्रह्म ध्वज केवल एक ध्वज नहीं बल्कि आस्था और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। केसरिया रंग का यह ध्वज साहस विजय और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है। इस ध्वज में दो पताकाएं होती हैं और उसके मध्य में सूर्य का चिन्ह बना होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार जब यह ध्वज मंदिर के शिखर पर फहराया जाता है तब यह चारों दिशाओं में विजय और मंगल का संदेश फैलाता है। इसलिए गुड़ी पड़वा के दिन इस ध्वज को फहराना बेहद शुभ माना जाता है और हजारों श्रद्धालु इस परंपरा के साक्षी बनने उज्जैन पहुंचते हैं।
उज्जयिनी मुद्रा का इतिहास और महत्व
सम्राट विक्रमादित्य ने इस परंपरा से जुड़ी एक विशेष मुद्रा भी जारी की थी जिसे उज्जयिनी मुद्रा कहा जाता है। इस प्राचीन सिक्के के एक तरफ भगवान शिव का चित्र सूर्यदंड के साथ दर्शाया गया है जबकि दूसरी तरफ उज्जयिनी का विशेष चिन्ह अंकित किया गया है।
उस समय उज्जैन केवल धार्मिक नगरी ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार का भी एक बड़ा केंद्र था। यही कारण था कि इन मुद्राओं का आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व भी काफी अधिक था। यह सिक्के उस दौर की समृद्धि और व्यापारिक ताकत का प्रमाण माने जाते हैं।
उज्जयिनी चिन्ह का गहरा अर्थ
उज्जयिनी मुद्रा के मध्य में प्लस के आकार का एक चिन्ह बना होता था और उसकी चारों भुजाओं पर गोलाकार आकृतियां बनाई गई थीं। इतिहासकारों के अनुसार यह चिन्ह यह संदेश देता था कि उज्जैन पृथ्वी के केंद्र में स्थित एक प्रमुख नगर है।
यह नगर जल मार्ग वायु मार्ग और स्थल मार्ग के जरिए दुनिया के कई क्षेत्रों से जुड़ा हुआ था। इसलिए यह चिन्ह उस समय उज्जैन की समृद्धि और वैश्विक संपर्क का प्रतीक माना जाता था।
परंपरा को फिर से जीवित करने की पहल
इस ऐतिहासिक परंपरा को एक बार फिर जीवित करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने भी पहल की है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर महाकाल मंदिर के शिखर के साथ साथ उज्जैन शहर के कई प्रमुख भवनों पर भी ब्रह्म ध्वज फहराने की परंपरा शुरू की जा रही है।
इस पहल का उद्देश्य उज्जैन की ऐतिहासिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को देश और दुनिया के सामने नई ऊर्जा के साथ प्रस्तुत करना है। इससे आने वाले समय में उज्जैन की परंपराओं को और भी मजबूत पहचान मिल सकती है।
अब श्रद्धालु भी चढ़ा सकते हैं महाकाल मंदिर पर ब्रह्म ध्वज
इस परंपरा की एक खास बात यह भी है कि अब आम श्रद्धालु भी महाकाल मंदिर के शिखर पर अपने नाम से ब्रह्म ध्वज चढ़वा सकते हैं। इसके लिए मंदिर कार्यालय में 1100 रुपये की रसीद कटवानी होती है।
इसके अलावा ध्वज की खरीद पूजन अखाड़े को भेंट और मंदिर के शिखर पर ध्वज लगाने वाले कर्मचारियों का भुगतान अलग से करना पड़ता है। कुल मिलाकर लगभग तीन हजार रुपये के खर्च में कोई भी श्रद्धालु अपने नाम से महाकाल मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज चढ़वा सकता है। इस वजह से भक्तों में इस परंपरा को लेकर काफी उत्साह देखा जा रहा है।
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