महमूद मदनी ट्रस्ट विवाद: देहरादून प्रशासन का बड़ा एक्शन, धौलास में अवैध प्लॉटिंग पर चला कानून का डंडा
शेखुल एजुकेशनल चेरिटेबल ट्रस्ट भूमि प्रकरण में 193 लोगों को नोटिस, पांच की अनुमति रद्द
देहरादून। उत्तराखंड में शेखुल एजुकेशनल चेरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े भूमि खरीद-फरोख्त मामले में देहरादून जिला प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी है। प्रशासन ने तथ्यों को छिपाकर भूमि उपयोग परिवर्तन (धारा 143) कराने वाले पांच लोगों की अनुमति निरस्त कर दी है। इसके अलावा ट्रस्ट की ओर से दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर बेची गई भूमि के संबंध में 193 लोगों को नोटिस जारी गया गया है।
विकासनगर के उपजिलाधिकारी विनोद कुमार ने शुक्रवार को बताया कि सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। 27 फरवरी तक जवाब मांगा गया है। मामले की जांच जारी है। प्रशासन यह भी जांच कर रहा है कि ट्रस्ट की नियमावली का पालन हुआ या नहीं तथा भूमि लेन-देन से ट्रस्ट को कोई वित्तीय लाभ प्राप्त हुआ है या नहीं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी होने के बाद तथ्यों के आधार पर आगे की विधिक कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार जांच में यह देखा जाएगा कि पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से भूमि विक्रय की प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता या तथ्य छिपाने की बात तो नहीं हुई। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि क्या भूमि क्रेताओं से किसी न्यायिक निर्देश को छिपाया गया।
यह ट्रस्ट महमूद मदनी की ओर से स्थापित बताया जाता है। मदनी ने अपने शेखुल एजुकेशनल चेरिटेबल ट्रस्ट को इस्लामिक शिक्षण संस्था (मुस्लिम यूनिवर्सिटी) के लिए बनाया था। प्रशासन ये भी देख रहा है कि दिल्ली में पंजीकृत उक्त ट्रस्ट की नियमावली का उलंघन तो नहीं हुआ क्योंकि कुछ विधि जानकार मानते हैं कि चेरिटेबल ट्रस्ट की भूमि बेची नहीं जा सकती। यदि बेची गई तो उसके लिए ट्रस्टियों की बोर्ड बैठक में लिखित सहमति जरूरी होती है और जब भूमि बेची जाती है तो वो हर सेल डीड में लगाई जानी जरूरी है। ट्रस्ट का उद्देश्य इस्लामिक शिक्षण संस्था की स्थापना बताया गया है।
विधि विशेषज्ञों के अनुसार चेरिटेबल ट्रस्ट सामान्यतः ‘नो प्रॉफिट, नो लॉस’ के सिद्धांत पर कार्य करते हैं। ऐसे में ट्रस्ट की संपत्ति के विक्रय के लिए ट्रस्टियों की बोर्ड बैठक में विधिवत स्वीकृति आवश्यक होती है और इसका उल्लेख संबंधित विक्रय विलेख में किया जाना चाहिए।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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