बिजनौर: लग्जरी कारों की जगह 'ट्रैक्टर' पर सवार होकर दुल्हन लेने पहुंचा दूल्हा, सादगी और किसान संस्कृति ने जीता सबका दिल
पेश की सादगी की अनूठी मिसाल; फिजूलखर्ची के दौर में अपनी मिट्टी और स्वाभिमान से जुड़ाव का दिया बड़ा संदेश
बिजनौर। आज के दौर में जहाँ शादियों में लग्जरी कारों, महंगी बग्गियों और दिखावे पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाने की होड़ लगी रहती है, वहीं जनपद के गांव खेड़ा के एक युवक ने समाज के सामने सादगी और स्वाभिमान का ऐसा उदाहरण पेश किया है जिसकी हर ओर चर्चा हो रही है। गांव के युवक शुभम कुमार ने अपनी शादी में किसी महंगी गाड़ी के बजाय अपने पिता राजकुमार के साथ 'अन्नदाता की शान' यानी ट्रैक्टर को अपनी बारात की सवारी बनाया। फूलों से सजा हुआ ट्रैक्टर जब गांव की गलियों से गुज़रा, तो इसे देखने के लिए लोगों का तांता लग गया।
यह बारात केवल एक विवाह उत्सव नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव और किसान संस्कृति के आत्मसम्मान का जुलूस थी। शुभम कुमार की इस पहल ने यह साबित कर दिया कि खुशियां और भव्यता दिखावे में नहीं, बल्कि सादगी और संस्कारों में छिपी होती है। ट्रैक्टर, जो किसान की मेहनत और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा प्रतीक है, उसे अपनी शादी की सवारी बनाकर शुभम ने युवाओं को फिजूलखर्ची के खिलाफ एक सकारात्मक संदेश दिया है।
युवाओं के लिए प्रेरणा बनी शुभम की पहल
बिजनौर की धरती हमेशा से सादगी और मेहनत के लिए जानी जाती रही है। शुभम कुमार की इस समझदारी भरी पहल ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिकता अपनाने का अर्थ अपनी जड़ों को भूलना नहीं है। ग्रामीणों ने भी इस अनोखी बारात का खुले दिल से स्वागत किया। बुज़ुर्गों का कहना है कि ऐसी बारात उन्होंने पहली बार देखी है, जिसने पुरानी परंपराओं और नए विचारों का अद्भुत संगम पेश किया है।
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समाज में जहां प्रतिष्ठा को दिखावे से जोड़कर देखा जाता है, वहां शुभम ने फिजूलखर्ची से बचकर सामाजिक संतुलन और आर्थिक समझदारी की दिशा दिखाई है। शुभम की यह पहल उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सामाजिक दबाव में आकर शादियों में भारी कर्ज या दिखावा करते हैं। इस बारात ने यह विचार साझा किया कि अपनी पहचान और जड़ों पर गर्व करना ही असली शान है।
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