'प्रह्लाद कुंड' है होलिका दहन की पौराणिक घटना का साक्ष्य, जहाँ होलिका हुई भस्म, प्रह्लाद की भक्ति से हुई थी धर्म की जीत
रंगों का त्योहार 'होली' इस बार 4 मार्च को मनाया जा रहा है। होली से एक दिन पहले होने वाला 'होलिका दहन' न केवल एक परंपरा है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में स्थित 'प्रह्लाद कुंड' इस ऐतिहासिक और पौराणिक घटना का सबसे बड़ा साक्षी माना जाता है।
अधर्म का अंत और भक्ति की शक्ति
पुराणों के अनुसार, असुरराज हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु का परम शत्रु था। वह स्वयं को भगवान मानकर प्रजा पर अत्याचार करता था। जब उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्त निकला, तो हिरण्यकश्यप का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका का सहारा लिया, जिसे वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी।
हिरण्यकश्यप के आदेश पर होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका स्वयं भस्म हो गई। इसी विजय के जश्न में तब से लोग फूल बरसाकर और रंगों के साथ इस दिन को मनाते हैं, जिसे आज हम होली कहते हैं।
धार्मिक आस्था का केंद्र है प्रह्लाद कुंड
उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, हरदोई का यह प्रह्लाद कुंड एक पावन स्थली है। कुंड के समीप ही एक छोटा-सा प्राचीन मंदिर है, जहाँ भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की पूजा-अर्चना की जाती है। होलिका दहन के दिन यहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यहाँ दर्शन करने से कष्टों का नाश होता है और व्यक्ति को अलौकिक शक्ति का अहसास होता है। यह कुंड आज भी नई पीढ़ी को यह सीख देता है कि सच्ची भक्ति और श्रद्धा के सामने बड़ी से बड़ी बाधा भी छोटी हो जाती है।
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