होली का गहरा आध्यात्मिक रहस्य जानिए, कैसे यह पर्व अधर्म पर धर्म की विजय और सच्ची भक्ति की अमर कहानी बन गया
आज हम बात करेंगे होली के उस गहरे आध्यात्मिक अर्थ की जिसे हम अक्सर रंगों और मस्ती के पीछे भूल जाते हैं। हिंदू धर्म में होली सिर्फ गुलाल और खुशियों का त्योहार नहीं है बल्कि यह आत्मा को शुद्ध करने और भगवान के प्रति समर्पण को मजबूत करने का पावन अवसर है। इस वर्ष होली 4 मार्च को मनाई जाएगी जबकि 2 मार्च को होलिका दहन होगा। हमारे पवित्र ग्रंथों में इस उत्सव का बेहद सुंदर और प्रेरणादायक वर्णन मिलता है जो हमें जीवन की सच्चाई से रूबरू कराता है।
विष्णु पुराण में प्रह्लाद की भक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय
विष्णु पुराण में होली का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकशिपु से जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार अहंकार में डूबे हिरण्यकशिपु ने अपने ही पुत्र को भगवान विष्णु की भक्ति छोड़ने का आदेश दिया। जब प्रह्लाद नहीं माने तो उन्हें कई प्रकार की यातनाएं दी गईं। अंत में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए क्योंकि उसे आग से न जलने का वरदान था।
लेकिन जब अग्नि जली तो अधर्म का साथ देने वाली होलिका स्वयं जलकर भस्म हो गई और भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए। यह घटना बताती है कि सच्ची श्रद्धा और ईश्वर पर अटूट विश्वास इंसान को हर संकट से बचा सकता है। संदेश साफ है कि अहंकार और अन्याय चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो अंत में सत्य की ही जीत होती है।
श्रीमद्भागवत पुराण में फाल्गुनोत्सव और कृष्ण प्रेम का संदेश
श्रीमद्भागवत पुराण में होली को फाल्गुनोत्सव के रूप में दर्शाया गया है। यहां यह उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की ब्रज लीला से जुड़ा है। ग्रंथ में वर्णन मिलता है कि किस तरह कान्हा ने गोपियों के साथ फूलों और गुलाल से होली खेली और समाज के ऊंच नीच के भेदभाव को समाप्त किया।
भागवत पुराण हमें सिखाता है कि होली केवल बाहरी रंगों से खेलने का दिन नहीं बल्कि आत्मा को परमात्मा के प्रेम के रंग में रंगने का अवसर है। जब मन में भक्ति और प्रेम का भाव होता है तब जीवन की कटुता स्वतः समाप्त होने लगती है। सामूहिक भजन और प्रभु स्मरण से मन को शांति मिलती है और घर परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
नारद पुराण में होलिका पूजन और सकारात्मक ऊर्जा का महत्व
नारद पुराण में होलिका दहन की विधि और पूजा पद्धति का विशेष महत्व बताया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा की रात विधि विधान से अग्नि की पूजा करना और उसमें नई फसल के अनाज की आहुति देना शुभ माना गया है। ऐसा करने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और घर में सुख समृद्धि आती है।
नारद पुराण यह भी बताता है कि होलिका की पवित्र राख को माथे पर लगाने से मानसिक तनाव कम होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है। इस दिन नए कार्य शुरू करने के बजाय ईश्वर के ध्यान में समय बिताना अधिक लाभकारी माना गया है। इन नियमों का पालन करने से जीवन में संतुलन और सकारात्मकता बनी रहती है।
होली का असली आध्यात्मिक संदेश
होली हमें याद दिलाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं यदि हमारा मन ईश्वर में स्थिर है तो कोई भी शक्ति हमें डिगा नहीं सकती। यह पर्व हमें अपने भीतर छिपे अहंकार को जलाने और प्रेम को अपनाने की प्रेरणा देता है। जब हम द्वेष और घृणा को त्यागकर प्रेम और भाईचारे को अपनाते हैं तभी होली का सच्चा अर्थ पूरा होता है।
इस पावन अवसर पर जरूरत है कि हम केवल रंगों से नहीं बल्कि अच्छे विचारों से भी अपने जीवन को रंगें। भक्ति धैर्य और सकारात्मक सोच ही वह रंग हैं जो कभी फीके नहीं पड़ते।
रॉयल बुलेटिन से जुड़ें:
देश-प्रदेश की ताज़ा ख़बरों को सबसे पहले पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करें:
आपको यह खबर कैसी लगी? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर दे। आपकी राय रॉयल बुलेटिन को और बेहतर बनाने में बहुत उपयोगी होगी।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
युवा और ऊर्जावान पत्रकार चयन प्रजापत 'रॉयल बुलेटिन' के लिए मध्य प्रदेश के इंदौर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आपकी मुख्य विशेषज्ञता खेल (Sports), कृषि (Farming) और ऑटोमोबाइल (Automobile) सेक्टर में है। चयन प्रजापत इन विषयों की तकनीकी समझ के साथ-साथ ज़मीनी हकीकत को अपनी खबरों में पिरोने के लिए जाने जाते हैं। इंदौर और मालवा क्षेत्र की खबरों के साथ-साथ ऑटोमोबाइल और खेल जगत की विशेष कवरेज के लिए आप रॉयल बुलेटिन के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

टिप्पणियां