यह सामान्य भ्रांति है कि धन की अधिकता असीम सुख देती है और धन के अभाव से अत्यधिक दुख मिलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हृदय की अलौकिक शांति ही वास्तविक सुख है और इसका धन के होने या न होने से कोई संबंध नहीं है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, भौतिक सुख और धन के बाद भी अधिकांश लोग अपने जीवन में अशांत और क्षुब्ध दिखाई देते हैं। धन की प्रभुता कभी-कभी मदांध पैदा करती है और विवेक की धार को कुंठित कर देती है, जिससे व्यक्ति नकारात्मक कार्यों की ओर आकर्षित होता है।
ये भी पढ़ें चंद्र ग्रहण: आज अयोध्या में रामलला और हनुमानगढ़ी के दर्शन बंद, सूतक काल के दौरान बरतें ये सावधानियांविशेषज्ञों का कहना है कि सुख और दुख की स्थिति अज्ञानता पर भी निर्भर करती है। अज्ञान के हटने पर व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार सुख-दुख से प्रभावित रहते हुए उसके पार जाकर स्थायी शांति का अनुभव कर सकता है। सुख सामान्यतः परिस्थितियों में अनुकूलता का अनुभव करना है, जबकि प्रतिकूल परिस्थितियां भी व्यक्ति के लिए वरदान साबित हो सकती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में पुराने पापों का क्षरण होता है और जीवन में छिपा मंगल प्रकट होता है।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि धन की अधिकता केवल अस्थायी सुख देती है, जबकि हृदय की शांति और विवेक आधारित जीवन ही स्थायी आनंद का स्रोत है।

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