धर्म के नाम पर हिंसा नहीं, मानवता ही सच्ची पूजा
आज का मनुष्य अज्ञानता के उस गहरे अंधकार में है, जहाँ वह निर्जीव मूर्तियों को प्रसन्न करने और ईश्वर का आशीर्वाद पाने के लिए बेजुबान पशुओं की बलि चढ़ाने को पुण्य समझता है। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए हम परमपिता की एक संतान की हत्या करते हैं और उम्मीद करते हैं कि वह ईश्वर हमें आशीर्वाद देगा। जिस प्रकार एक पिता अपनी एक संतान की हत्या करने वाली दूसरी संतान से कभी प्रसन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार ईश्वर भी अपनी बनाई सृष्टि के विनाश से कैसे खुश हो सकता है?
परमात्मा का प्रकाश हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई—सभी के भीतर समान रूप से व्याप्त है। सच्चा मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च तो यह 'मनुष्य शरीर' ही है, जिसे स्वयं ईश्वर ने रचा है। लेकिन विडंबना देखिए, लोग मानव निर्मित निर्जीव इमारतों के संरक्षण और उनके नाम पर होने वाले झगड़ों में इतने अंधे हो जाते हैं कि वे ईश्वर द्वारा निर्मित इन 'सजीव मंदिरों' (इंसानों) को नष्ट करने में जरा भी संकोच नहीं करते।
धर्म के नाम पर हिंसा और बलि के मार्ग को स्वर्ग का साधन मानना केवल अज्ञानता है। वास्तविक धर्म तो जीव मात्र के प्रति दया और मनुष्य की गरिमा का सम्मान करने में ही निहित है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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