सुख-दुख से परे शान्ति का सत्य: चित्त की स्वाभाविक अवस्था को समझें
मानव जीवन में सुख और दुख का चक्र निरंतर चलता रहता है। अक्सर दुख की घड़ी में हम महसूस करते हैं कि मन की शान्ति पूरी तरह समाप्त हो गई है और अशान्ति ने डेरा डाल लिया है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। शान्ति तो दुख के क्षणों में भी हमारे भीतर विद्यमान रहती है, बस उस समय उसकी अनुभूति नहीं हो पाती। इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। जिस प्रकार एक वस्त्र के गंदा होने पर भी उसकी मूल स्वच्छता कहीं जाती नहीं है, क्योंकि स्वच्छता ही वस्त्र का वास्तविक स्वरूप है। मैल केवल स्वच्छता को ढक लेता है। ठीक इसी प्रकार सुख, दुख और चिंता के समय भी शान्ति हमारे चित्त में ही रहती है, किन्तु हर्ष और शोक के आवेग उसे ओझल कर देते हैं।
परिस्थितियों का प्रभाव और शान्ति का प्रकटीकरण
जैसे मैले वस्त्र को धो देने पर उसकी स्वच्छता तत्काल प्रकट हो जाती है, वैसे ही जब अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों का मोह समाप्त होता है, तो सुख और दुख का अभाव हो जाता है। इसी अभाव की स्थिति में हमें उस शान्ति का अनुभव होने लगता है जो पहले से ही भीतर मौजूद थी। यह समझना आवश्यक है कि स्वच्छता बाहर से नहीं आती बल्कि वस्त्र के भीतर ही समाहित होती है। उसी प्रकार शान्ति भी किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति से प्राप्त नहीं होती, वह हमारे चित्त की ही एक अवस्था है। सुख, दुख और शान्ति को चित्त की तीन दिशाएं माना जा सकता है, जो एक ही मुख की तीन विभिन्न स्थितियों रोना, हंसना और शांत रहने के समान हैं।
हर्ष और शोक से परे है सहज अवस्था
दार्शनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हंसना हर्ष का प्रतीक है और हर्ष ही सुख है। इसके विपरीत रोना शोक का प्रतीक है और शोक ही दुख है। कोई भी मनुष्य निरंतर हंसते हुए या निरंतर रोते हुए अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता क्योंकि ये दोनों ही स्थितियां ऊर्जा का क्षय करती हैं। इसके उलट मनुष्य हंसने और रोने से रहित अर्थात शांत दशा में सबसे अधिक समय तक रह सकता है। सुख और दुख के अनुभव के लिए हमें अनुकूल या प्रतिकूल बाहरी परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, लेकिन शान्ति प्राप्त करने के लिए केवल इन दोनों के अभाव की जरूरत है।
स्वभाव और अभ्यास का महत्व
अंततः यह स्पष्ट है कि सुख और दुख जीवन में आने-जाने वाली लहरों के समान हैं, जबकि शान्ति हमारा मूल स्वभाव है। इसलिए जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में, चाहे वह लाभ की हो या हानि की, स्वयं को शांत रखने का प्रयास करना चाहिए। जब हम यह जान लेते हैं कि शान्ति कहीं बाहर से नहीं आनी है बल्कि भीतर के शोर को कम करने से प्रकट होनी है, तब जीवन जीने का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। प्रत्येक परिस्थिति में समभाव बनाए रखना ही मानसिक शान्ति की कुंजी है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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