धर्म तो बढ़ रहा है, पर आपसी भाईचारा क्यों घट रहा है?
आज समाज में धार्मिक गतिविधियों का दृश्य अत्यधिक दिखाई दे रहा है। मंदिरों में कीर्तन और पाठ हो रहे हैं, जागरण का आयोजन हो रहा है, तीर्थ यात्राओं में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी है। मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों में भी लोग पहुंचकर अपनी आस्था व्यक्त कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश लोग धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि, इन धार्मिक आयोजनों के बीच समाज में अशांति और अविश्वास की मात्रा बढ़ती जा रही है। आपसी भाईचारे में कमी आई है और लोगों में एक-दूसरे की सहायता करने की प्रवृत्ति घट गई है। विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति धर्म पालन की कमी और कुछ स्वयम्भू धार्मिक ठेकेदारों के कारण उत्पन्न हुई है।
धर्म के नाम पर प्रतिदिन झगड़े और फसाद की खबरें सामने आ रही हैं। समाज में जाति, ऊंच-नीच और धर्म के आधार पर फूट पैदा की जा रही है। यह विभाजन और भेदभाव मानव निर्मित हैं, जिन्हें परमात्मा ने नहीं रचा। धर्म के वास्तविक संदेश और मानवता के सिद्धांतों के विपरीत चलने वाले कर्मों ने समाज में तनाव और असहमति बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंसान को धर्म का सही अर्थ समझकर आपसी प्रेम, सहयोग और भाईचारे के साथ चलना चाहिए। यदि धर्म के मूल सिद्धांतों पर ध्यान दिया जाए, तो समाज में शांति और सद्भाव की स्थिति बन सकती है।
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