लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस ..ओम बिरला का लोकसभा में ना जाने का फैसला, 9 मार्च को प्रस्ताव पर चर्चा होगी
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में तकनीकी खामी, विपक्ष की किरकिरी
नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की विपक्ष की कोशिश उस समय अटक गई, जब प्रस्ताव के नोटिस में तकनीकी खामियां पाई गईं। नोटिस में वर्ष 2026 की जगह बार-बार 2025 लिखा गया था, जिसे गंभीर प्रक्रियागत चूक माना गया। इसके बाद कांग्रेस को संशोधित नोटिस के साथ प्रस्ताव दोबारा जमा करना पड़ा।
प्रक्रियागत नियमों के अनुसार, ऐसे किसी भी प्रस्ताव में सभी जानकारियों का सटीक और तथ्यात्मक रूप से सही होना अनिवार्य होता है। साल की गलती सामने आने के बाद नोटिस को स्वीकार नहीं किया गया, जिससे विपक्ष को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल ही में तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ लाए गए एक प्रस्ताव को भी तकनीकी कारणों से खारिज कर दिया गया था। उस समय उनके उपनाम की वर्तनी में गलती पाई गई थी। लगातार हो रही ऐसी चूकों ने विपक्ष की रणनीति और तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विपक्षी दलों का आरोप है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला सदन की कार्यवाही का संचालन पक्षपातपूर्ण तरीके से कर रहे हैं। हालांकि, संख्या बल को देखते हुए इस अविश्वास प्रस्ताव को प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है, क्योंकि इसके पारित होने की संभावना बेहद कम है।
तकनीकी गलती के चलते कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को राजनीतिक रूप से शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब सरकार और विपक्ष के बीच टकराव अपने चरम पर है और विपक्ष लगातार अध्यक्ष पर सदन को “एकतरफा तरीके से” चलाने का आरोप लगा रहा है।
मंगलवार को विपक्षी दलों ने संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपा। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने बताया कि यह नोटिस दोपहर 1 बजकर 14 मिनट पर लोकसभा के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों के नियम 94सी के तहत औपचारिक रूप से जमा किया गया।
कांग्रेस के अनुसार, इस प्रस्ताव पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम समेत कई दलों ने प्रस्ताव का समर्थन किया है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने अब तक इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। नोटिस में विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बार-बार उन्हें सदन में जनहित के मुद्दे उठाने का अवसर नहीं दिया, जिसके चलते उन्हें अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला पर सदन के संचालन में पक्षपात का आरोप लगाते हुए कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ मंगलवार को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। हालांकि इस पर तृणमूल कांग्रेस के किसी भी सांसद का हस्ताक्षर नहीं है। हस्ताक्षर करने वाले 118 सांसदों में राहुल गांधी का भी नाम नहीं है। सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि ओम बिरला अब लोकसभा नहीं जाएंगे। अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के बाद ही वह स्पीकर की चेयर संभालेंगे।
लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने पत्रकारों को बताया कि अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा महासचिव को संविधान के अनुच्छेद 94-सी के तहत दिया गया है। नोटिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), द्रविण मुनेत्र कड़गम (द्रमुक), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और अन्य शामिल हैं। हालांकि गोगोई ने इस नोटिस पर तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के हस्ताक्षर नहीं होने से जुड़े सवाल पर चुप्पी साध ली।नोटिस में कहा गया है कि लोकसभा स्पीकर लगातार विपक्षी सांसदों को जनहित के मुद्दे उठाने से रोक रहे हैं।
अनुच्छेद 94(सी) के तहत नोटिस दिया गया है क्योंकि स्पीकर खुलेआम पक्षपात कर रहे हैं। इसके साथ ही विपक्ष के आठ सांसदों को मनमाने ढंग से निलंबित कर दिया गया है; उन्हें केवल लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करने के लिए दंडित किया जा रहा है।नोटिस में लिखा गया है कि कई मौकों पर विपक्षी दलों के नेताओं को बोलने की अनुमति ही नहीं दी गई, जबकि यह उनका मौलिक अधिकार है।नियमों के मुताबिक नोटिस मिलने के बाद प्रस्ताव पेश करने और इस पर चर्चा के लिए तारीख तय की जाती है, जो नोटिस की तिथि से कम से कम 14 दिन बाद होती है। आमतौर पर प्रस्ताव स्वीकार होने के 10 दिनों के भीतर बहस और मतदान होता है। जब प्रस्ताव विचाराधीन होता है, तो स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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