पल-पल रंग बदलते इंसान
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। यह उक्ति हम मनुष्यों पर सटीक बैठती है। हम मनुष्य एक-दूसरे की नकल बहुत शीघ्र कर लेते हैं। दूसरों के अच्छे कामों को बहुत पसंद करते हैं परन्तु जब उन्हें अपनाने की बारी आती है तो हम आनाकानी करने लगते हैं। हम सोचते हैं कि ये सभी कार्य […]
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। यह उक्ति हम मनुष्यों पर सटीक बैठती है। हम मनुष्य एक-दूसरे की नकल बहुत शीघ्र कर लेते हैं।
दूसरों के अच्छे कामों को बहुत पसंद करते हैं परन्तु जब उन्हें अपनाने की बारी आती है तो हम आनाकानी करने लगते हैं। हम सोचते हैं कि ये सभी कार्य दूसरे करें या दूसरों के घर से इनकी शुरुआत हो।
इसके विपरीत दूसरों के गलत कार्यों का बिना परिणाम सोचे-समझे हम एकदम से नकल करने लगते हैं। पड़ोसी के घर बेइमानी या रिश्वत का पैसा बहुत आ रहा है और उनकी सुख-समृद्धि में अचानक बढ़ोत्तरी हो रही है। यह बात हम पचा नहीं पाते और चल पड़ते हैं उसी गलत राह पर।
इसी प्रकार भ्रष्टाचारी, चोरबाजारी, दूसरों का गला काटकर अपने वैभव को बढ़ाने में हम पलभर भी नहीं गंवाना चाहते। इसके लिए हमें कोई भी मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। इसका परिणाम कुछ भी होगा देखा जाएगा वाली हमारी प्रवृत्ति बनती जा रही है। बिना सोचे-समझे हम हर जगह अपनी नाक घुसेड़ते रहते हैं।
पड़ोसी या मित्र के घर नई गाड़ी, बड़ा फ्रिज, बड़ा टीवी, महंगा मोबाइल आदि आ जाएँ या वे नया घर खरीद लें तो हमारे दिन-रात का चैन खो जाता है। पता नहीं हमारी नाक कैसी है जो जरा सी बात पर कटने लगती है। फिर बस कवायद शुरु हो जाती है उसे खरीदने की चाहे हमारे पास पैसा है नहीं। हमें कर्जा भी लेना पड़ेगा तो कोई समस्या नहीं पर हमारी तो नाक ऊँची हो जाएगी।
गिरगिट तो मुसीबत आने पर रंग बदलती रहती है परन्तु हम इंसान तो पल-पल में अपना रंग बदलते रहते हैं। हमारे लिए हर समय एक जैसा ही रहता है। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए गधे को भी बाप बनाने में परहेज नहीं करते। उसके लिए खड़े-खड़े पचासों बयान बदल देते हैं जिसकी आवश्यकता ही नहीं होती। चाहे सुनने वाला हमारी मक्कारी समझकर हमारी पीठ पीछे मजाक ही क्यों न उड़ाए। हम सोच लेते हैं कि हमने उसे उल्लू बना दिया है पर यह नहीं समझ पाते हैं कि अनजाने में हमारा ही उल्लू बन गया है।
रत्नाकर डाकू (महर्षि वाल्मीकि) और अगुलीमाल डाकू (जो महात्मा बुद्ध का शिष्य बना) जैसे कुछ ही लोग होते हैं जो सज्जनों की संगति में आकर अपने कुमार्ग को त्याग कर सन्मार्ग पर आ जाते हैं। इन्हें हम अपवाद के रूप में मान सकते हैं।
इस संसार में प्राय: ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो सच्चाई व ईमानदारी के रास्ते को छोड़कर किसी भी कारण से या लालचवश शार्टकट अपनाने के कारण कुमार्गगामी बन जाते हैं। समय बीतने पर जब उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है या उनकी पोल खुल जाती है तब वे दुखी हो जाते हैं। सबसे नजरें चुराते हुए वे अपने आप को सबसे काटकर अकेला कर लेते हैं।
हमें खरबूजे की तरह रंग बदलने वाला बनने के स्थान पर अपने असूलों पर डटे रहना चाहिए। जो अपने नियम-कानून का पालन करता है वही विश्व में पूजनीय होता है। हमें अपने विचारों की दृृढ़ता बनाए रखनी चाहिए जिससे हमारी अपनी एक संयमित छवि सबके समक्ष आ सके। हम अपना सम्मानित स्थान संसार में बनाए रख सकें।
-चन्द्र प्रभा सूद
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