गांधी को कितना जानते हैं हम ?

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गांधी जी का व्यक्तित्व इतना बड़ा और समुंदर की तरह है, आप जितना डूबेंगे उतनी गहराई में बोध भी पाएंगे। भारत मे गांधी ने आंदोलन मूलत: अंग्रेजों को भारत से हटाने के लिए किया था, जबकि दक्षिण अफ्रीका में उनका आंदोलन दक्षिण अफ्रीका से अंग्रेजों को हटाने के वनिस्पत वहाँ के सिस्टम मे सुधार करने […]

गांधी जी का व्यक्तित्व इतना बड़ा और समुंदर की तरह है, आप जितना डूबेंगे उतनी गहराई में बोध भी पाएंगे। भारत मे गांधी ने आंदोलन मूलत: अंग्रेजों को भारत से हटाने के लिए किया था, जबकि दक्षिण अफ्रीका में उनका आंदोलन दक्षिण अफ्रीका से अंग्रेजों को हटाने के वनिस्पत वहाँ के सिस्टम मे सुधार करने का था। और गांधी जी ने अपना सत्य का प्रयोग भी वहीं से शुरू किया था। पैनी दृृष्टि से हमें उनके दक्षिण अफ्रीका में किए गए आंदोलनों का अध्ययन करना चाहिए जहां उन्होंने पूरा जोर व्यवस्था के खिलाफ ही लगाया था क्योंकि अंतर बहुत बारीक है।
गांधी हृदय परिवर्तन के लिए आंदोलन करते थे। गांधी अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन करते हुये भी राजनिष्ठा से स्वाभाविक प्रेम किया करते थे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होने ‘गाड सेव द किंग’ बिना किसी आडंबर के गाया था। गांधी ने कभी व्यक्ति से शत्रुता नहीं रखी वरन वे तो सामने वाले व्यक्ति के हृदय से बुराई निकालने में ही लगे रहते थे।
दक्षिण अफ्रीका में एक चर्चा के दौरान डा. बूथ से उन्होंने कहा था ‘शत्रु कहलाने वाले लोग दगा ही करेंगे, यह कैसे मान लिया जाए? यह कैसे कहा जा सकता है कि जिन्हें हमने अपना शत्रु माना, वे बुरे ही होंगे’। गांधी हमेशा अपने बयानों एवं कदमों का स्वत: आत्मपरीक्षण किया करते थे और अगर उन्हें लगता था कि उनका कदम या बयान गलत संदर्भ में जा रहा है तो आगे बढ़कर स्थिति को संभालते थे और कई बार तो सार्वजनिक माफी भी मांगते थे।
आंदोलन को स्थगित एवं बंद करने का भी साहस उनमें था, अगर उन्हें लगता था कि इस आंदोलन के लिए आत्मसुधार पहले जरूरी है। गांधी खुले मन से , आत्मविश्वास से ईश्वर एवं सत्य की शक्ति पर विश्वास करते हुये सामने वाले का हृदय परिवर्तन करना चाहते थे। उनके सिद्धांतों से ऐसा लगता था कि किसी पर दवाब डालना हिंसा का ही एक रूप है। इसलिए उनका अनशन अक्सर आत्मसुधार के लिए होता था बनिस्पत दबाव बनाने के और ये बारीकी हमें बहुत गहराई से गांधी के सत्य के प्रयोग का अध्ययन करने पर ही प्राप्त होगी ।
मुद्दों के प्रति गांधीजी का फोकस और टकराव से बचना उनकी नीति थी। गांधी की समझौता वृत्ति उन्हें उनके मंजिल की तरफ जाने में एक सीढ़ी एवं गति का बढ़ाने का काम करती थी। अपने सत्य एवं मंजिल की राहों में वे कभी भी ऐसी बातों को टकराव का मुद्दा नहीं बनाते थे जिससे कि मूल विषय से उनका फोकस चेंज हो जाए। मुद्दों के प्रति अपने फोकस को वो किसी भी कीमत पर चेंज नहीं होना देने चाहते थे और दूरदृृष्टि मे अपने विवेक एवं विश्लेषण का प्रयोग करते थे।
गांधी का व्यक्तित्व जमीन को दृृढ़ता से पकड़े हुये एक लचीले वृक्ष के समान था जिसको ये एहसास था कि उन्हें असंख्य राहगीरों को छाया देनी है, अत: अकड़कर टूटने से ज्यादे वो वृक्ष की जड़ की दृृढ़ता को बनाए रखते थे और अनावश्यक आंधियों से टकराने में वक्त जाया नहीं करते थे।
इसीलिए नेटाल कीं एक वकील सभा में जब न्यायाधीश ने गांधी के प्रवेश का फैसला सुनाया और उन्हें पगड़ी उतारने को कहा तो गांधी स्वत: ही पगड़ी उतारने को राजी हो गए हालांकि इसके पहले हुयी एक घटना में उन्होने लाख दबाव के बाद पगड़ी उतारने से मना कर दिया था। उनका मानना था कि न्यायालय में कार्य करते वक्त न्यायालय का नियम पालन करना चाहिए तथा पगड़ी पहनने की अनावश्यक दृृढ़ता उन्हें उनके उद्देश्यों से भटका देगी । हालांकि उनके कई मित्र उनसे इस समझौता वृत्ति से नाराज रहते थे लेकिन गांधी जड़ की दृृढ़ता बनाए रखते हुये अपने तने एवं टहनियों को लचीला बनाए रखते थे।
गांधी जी प्रतिपक्षी को भी न्याय दिलाने में विश्वास रखते थे, तभी तो तत्कालीन कलकत्ता में ‘इंगलिशमैन’ के संपादक का विचार गांधीजी के प्रति यह था कि गांधी में अतिशयोक्ति का अभाव एवं कर्तव्यपरायणता थी। उनका मानना था कि गांधी गोरों का पक्ष भी निष्पक्षता से रखते थे और ये विचार रखते थे कि प्रतिपक्षी को न्याय दिला के ही न्याय को जल्दी पाया जा सकता है।
गांधीजी एक व्यक्ति के प्रति दोनों भाव रखते थे।गांधी समूचे समुदाय या व्यक्ति से घृणा नहीं करते थे बल्कि वे उनके दोषों से घृणा एवं गुणों से प्यार करते थे। एक व्यक्ति के प्रति वो दोनों भाव रखते थे। सामने वाला अंग्रेज है या हिंदुस्तानी, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। डरबन की समुद्र यात्रा के दौरान जब समूचे जहाज को प्लेग के कारण सूतक घोषित कर के बन्दरगाह के पहले ही रोक लिया गया तो जहाज के कप्तान के एक प्रश्न पर जिसमें उन्हें गोरों द्वारा चोट पहुंचाने की बात कही गयी थी, के जवाब में गांधी ने कहा था- ‘मुझे आशा है कि उन्हें माफ कर देने की और उन पर मुकदमा न चलाने की हिम्मत ईश्वर मुझे देगा। आज भी मुझे उन पर रोष नहीं है। उनके अज्ञान व संकुचित दृृष्टि के लिए मुझे खेद होता है, मैं समझता हूँ कि जो वो कर रहे हैं, वह उचित है। ऐसा वे शुद्ध भाव से मानते हैं, अतएव मेरे लिए रोष का कोई कारण नहीं है।’
गांधी का आशय था कि व्यक्ति कोई गलती अज्ञानता के कारण ही करता है, अतएव प्रयास उसकी अज्ञानता दूर करने का किया जाना चाहिए न कि उससे द्वेष करने का।
गांधीजी ने अपने लिए कोई दायरे नहीं बनाये। गांधी का दृृढ़ विश्वास था कि व्यक्ति की आत्मा पवित्र होती है और जब उसे अपनी भूल का एहसास होगा तो वे शांत हो जाएंगे, अतएव वो किसी से भी दूरी बना के नहीं रखते थे।
सत्याग्रही प्रतिपक्षी का दृृष्टिकोण समझ उसके संभव अनूकूल हो जाते थे जिससे बातचीत आसान हो जाती थी। एक बार तो जब वो सत्याग्रह के लिए पूरी तरह से तैयार हो के हिन्दुस्तान आए तो तत्कालीन बंबई के गवर्नर ने उन्हें विशेष तौर पर गोखले के मार्फत बुलाया, और उनसे यह वचन मांगा कि सरकार के खिलाफ आप जब भी कोई कदम उठाएँ, एक बार उनसे बात कर लिया करें। आगे जो बात गांधी ने कही, उसे बड़ा गौर से सुनिएगा। ये उनके सत्याग्रह के दिग्दर्शी सिद्धान्त थे। गांधी ने कहा, ‘ये वचन देना मेरे लिए बहुत सरल है। क्योंकि सत्याग्रही के नाते मेरा ये नियम ही है कि किसी के विरुद्ध कोई कदम उठाना है तो पहले उसका दृृष्टिकोण उसी से समझ लूँ और जिस हद तक उसके अनुकूल होना संभव हो, उस हद तक अनुकूल हो जाऊँ। दक्षिण अफ्रीका मे मैंने सदा इस नियम का पालन किया है और यहाँ भी ऐसा ही करने वाला हूँ।’
गांधी सत्याग्रह का प्रयोग हृदय परिवर्तन के लिए ही करते थे न कि दबाव लाने के लिए। उनका स्वाभाविक विश्वास था कि सब एक ही ईश्वर की संतान हैं और उनमें सुधार ला के काम हो सकता है। इसीलिए तो एक बार नेटाल में उन्होने गोरों के खिलाफ, जब गोरों ने उनपे हमला किया था, मुकदमा चलाने से इंकार कर दिया और इंकार के बाद गोरे इतना शर्मिंदा हुए कि कई के विचार गांधी के प्रति बदल गए और वो उनकी बातों को सुनने लगे।
गांधी हमेशा वृक्ष की दृढ़ता को बनाए रखते हुये तने एवं टहनियों को लचीला बनाए रखते थे। उन्होंने हमेशा वृक्ष की दृृढ़ता को बनाए रखते हुये अपने तने एवं टहनियों को लचीला बनाए रखा और उन्हें कभी मर्यादित नहीं रखा। गांधी अपने तने एवं टहनियों को परिस्थितियों से तारतम्य बनाए रखने के लिए उन्हे हमेशा स्वतंत्र रखते थे।
गांधी राजनिष्ठ भी थे। गांधी कई बार राजनिष्ठा के पालन की दिशा में अपना व्यक्तिगत मत अलग रखते थे, और इसीलिए तो बोअर युद्ध के समय में व्यक्तिगत सहानुभूति बोअर निवासियों की तरफ से होते हुये भी ब्रिटिश राज्य की रक्षा में हाथ बटाना अपना धर्म समझा और घायलों की सेवा सुश्रुषा कर गोरों का हृदय परिवर्तन किया।
गांधी कभी भी किसी कौम या व्यक्ति के प्रति स्थायी भाव नहीं रखते थे। एक बार गांधी के पास जोहन्स्बर्ग के दो कुख्यात पुलिस अधिकारी कंगाल हो जाने के बाद आए जिनके खिलाफ कभी गांधी ने आंदोलन चलाया था और गांधी ने स्वत: आगे आकर उनकी मदद की और उनकी नौकरी जोहान्स्बर्ग की नगर पालिका में लगवाया। ऐसे थे गांधी जो कभी भी किसी कौम या व्यक्ति के प्रति स्थायी भाव नहीं रखते थे और कई मौकों पर हिंदुस्तानी मुहर्रिरों के साथ साथ अंग्रेजों को भी अपने घरों मे शरण देते थे।
गांधी को अपने सत्याग्रह पर इतना विश्वास था कि जूलु विद्रोह के वक्त अंग्रेजों से ही उन्होने उनके विरोधी जुलूवों की सेवा करने का अधिकार प्राप्त कर लिया और ये गांधी के व्यक्तित्व के निश्चल भाव का दम था कि अंग्रेज उनकी बात मान लेते थे।
गांधी के सत्याग्रह के दूसरे दिग्दर्शी सिद्धांतों में था कि सत्य का आग्रही रूढि़ से चिपटकर ही न कोई काम करे। वह अपने विचारों पर ही हठ पूर्वक न डटे रहे , हमेशा यह मानकर चले कि उसमें भी दोष हो सकता है और जब कभी दोष भी दोष का ज्ञान हो जाए, भारी से भारी जोखिमों को उठाकर भी उसे स्वीकार करे और प्रायश्चित भी करे। गांधी को अपने सत्याग्रह पर इतना विश्वास था कि वो ठगे जाने से बिलकुल नहीं डरते थे।
गांधीजी को ईश्वर की न्याय बुद्धि पर पूरा विश्वास था।गांधी ने अपने सत्याग्रह के तीसरे दिग्दर्शी सिद्धांतों मे ये बातें विलायत में सोराब जी से कही थी कि सत्याग्रही तो ठगे जाने के लिए ही जन्म लेता है लेकिन अंत मे तो वही ठगा जाता है जो ठगने वाला होता है। मुझे तो कभी भी ठगे जाने का भय नहीं रहता है और ईश्वर की न्याय बुद्धि पर मुझे पूरा विश्वास है।
ऐसे थे गांधी और उनका सत्याग्रह। मैंने ये लेख इसलिए लिखा कि गांधी के सत्य के प्रयोगों का मर्म आपके सामने ला सकूं। लेखक के रूप में मैंने तथ्यों के संकलन को यांत्रिकता प्रदान की है  लेकिन यकीन मानिए कि संपूर्णता में पता नहीं यह तथ्यात्मक यांत्रिक लेख कैसा गतिमान आशय ले के आए। मेरा आशय गांधी के सत्य की शक्ति को उजागर करना और उन्हें नहीं जानने वालों को बताना ताकि यदि वो विरोध भी करें गांधी का तो कम से कम उन्हें जान तो लें। एक लेखक के रूप में मैंने कुछ अधिकारों का अतिक्रमण किया है और गांधी जी के सत्याग्रह के कई विचारों में से तीन विचारों को यहाँ लिख के अपनी तरफ से गांधी के सत्याग्रह के तीन दिग्दर्शी सिद्धान्त नाम दिया है।  मैंने ऐसा इसलिए किया है कि गांधी जी के संदेशों को प्रभावी रूप से समझा सकूँ।
– पंकज गांधी

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अनिल रॉयल | Founder and Editor-in-Chief Picture

रॉयल बुलेटिन के संस्थापक एवं मुख्य संपादक अनिल रॉयल ने वर्ष 1985 में मात्र 17 वर्ष की आयु से मुज़फ्फरनगर की पावन भूमि से निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता का संकल्प लिया। बीते लगभग चार दशकों से वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सशक्त और विश्वसनीय आवाज़ के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

पत्रकारिता के अपने लंबे अनुभव के आधार पर उन्होंने वर्ष 2010 में नोएडा से रॉयल बुलेटिन के प्रिंट संस्करण का सफल विस्तार किया। समय के साथ बदलते मीडिया परिदृश्य को समझते हुए, उनके नेतृत्व में यह संस्थान आज एक मजबूत और प्रभावशाली डिजिटल समाचार मंच के रूप में स्थापित हो चुका है।

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