इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: पति के चरित्र पर कीचड़ उछालना 'क्रूरता'; बिना सबूत अवैध संबंधों का आरोप लगाना 'मानसिक हत्या'
कोर्ट ने मंजूर की पति की तलाक याचिका; कहा- लोकलाज और बच्चों के भविष्य के लिए पुरुष अक्सर झेलते हैं 'नरक' जैसी स्थिति; वाराणसी का है मामला
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों को लेकर एक ऐतिहासिक और कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पति के चरित्र पर बिना किसी साक्ष्य के कीचड़ उछालना क्रूरता की श्रेणी में आता है। न्यायमूर्ति नीरज तिवारी और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि बिना सबूत पति पर अवैध संबंध का आरोप लगाना उसकी सामाजिक और मानसिक हत्या करने जैसा है। इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ ही उच्च न्यायालय ने पीड़ित पति द्वारा दाखिल तलाक की अर्जी को मंजूर कर लिया है।
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने अत्यंत संवेदनशील पहलू पर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि यदि किसी पति ने वर्षों तक अपनी पत्नी के दुर्व्यवहार के खिलाफ कोई गिला-शिकवा नहीं किया, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह प्रताड़ित नहीं है। कोर्ट ने माना कि भारतीय समाज में पुरुष अक्सर लोकलाज, सामाजिक प्रतिष्ठा और बच्चों के बेहतर भविष्य के वास्ते घर के भीतर 'नरक' जैसी स्थिति झेलने को मजबूर होते हैं।
वाराणसी का मामला: पत्नी के व्यवहार ने पति को धकेला अवसाद में
यह पूरा प्रकरण वाराणसी का है। गुरुग्राम की एक निजी कंपनी में कार्यरत उप प्रबंधक की शादी 2003 में वाराणसी में तैनात एक अध्यापिका से हुई थी। पति का आरोप था कि पत्नी शंकालु स्वभाव की है और वह अपनी ही भाभी के साथ उसके अवैध संबंध होने का झूठा आरोप लगाती है। इतना ही नहीं, पति ने साक्ष्य पेश करते हुए बताया कि पत्नी ने छोटे बेटे को छत से लटकाने और वृद्ध मां पर गर्म दाल फेंकने जैसी क्रूर घटनाएं भी कीं। 2011 से दोनों अलग रह रहे थे।
निचली अदालत का फैसला पलटा
इससे पहले वाराणसी के परिवार न्यायालय ने पति की तलाक की अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी थी कि पति ने पत्नी के व्यवहार को माफ कर दिया है। हाईकोर्ट ने इस फैसले को त्रुटिपूर्ण माना। कोर्ट ने रिकॉर्ड में पाया कि पत्नी ने स्वयं पति के चरित्र पर लांछन लगाए थे, जिसने पति को गहरे अवसाद और आत्महत्या के कगार पर धकेल दिया था। कोर्ट ने कहा कि जब एक माँ अपने बच्चों को वर्षों तक छोड़ दे और पति पर झूठे लांछन लगाए, तो उस शादी का केवल ढांचा बचता है, रूह नहीं। ऐसी स्थिति में तलाक ही एकमात्र विकल्प है।
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