पुलिस सुरक्षा या 'स्टेटस सिंबल'? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी खर्च पर सुरक्षा मांगने वालों को लताड़ा
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस सुरक्षा की मांग को लेकर दाखिल याचिकाओं पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आम करदाताओं (टैक्सपेयर्स) के पैसे की कीमत पर पुलिस सुरक्षा लेना अब एक 'स्टेटस सिंबल' बनता जा रहा है। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की पीठ ने विकास चौधरी व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य को समाज में एक खास अधिकार वाला वर्ग बनाने वाले के रूप में नहीं देखा जा सकता।
संविधान और बराबरी के अधिकार का हवाला
हाई कोर्ट की पीठ ने संविधान की प्रस्तावना का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा देश एक लिखित संविधान के आधार पर चलता है, जो सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के साथ बराबरी का दर्जा देता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पुलिस सुरक्षा के जरिए सरकार और जनता के पैसे से एक विशेष वर्ग तैयार किया जा रहा है, जो संविधान के न्याय और समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है। जजों ने कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में सरकार की ओर से 'प्रिविलेज्ड' लोगों की श्रेणी बनाना उचित नहीं है।
अधिकारियों पर छोड़ा सुरक्षा का फैसला
याचिकाकर्ताओं ने अपनी जान को खतरा बताते हुए फोन हैकिंग, संपत्ति को नुकसान और झूठे ट्रस्ट डीड जैसे मामलों का हवाला देकर सुरक्षा की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि खतरे की प्रकृति का आकलन करना और सुरक्षा देने की जिम्मेदारी केवल संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की है। अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए कोर्ट किसी व्यक्ति विशेष के लिए सुरक्षा तय नहीं कर सकती। यह पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित प्रक्रिया है जिसे ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों को देखना चाहिए।
अदालत ने दखल देने से किया इनकार
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ताओं को सक्षम प्राधिकारी की ओर से पहले ही एक सुरक्षा गार्ड प्रदान किया गया है। कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा का मसला उचित प्राधिकारी ही तय करेगा, इसमें अदालत को दखल देने की आवश्यकता नहीं है। इस टिप्पणी के साथ ही हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सुरक्षा व्यवस्था खतरे की वास्तविक गंभीरता के आधार पर होनी चाहिए, न कि सामाजिक रसूख दिखाने के माध्यम के रूप में।
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