गेहूं की खेती पर मंडराया गर्मी का संकट, बढ़ता तापमान घटा सकता है पैदावार, ऐसे बचाएं फसल और मुनाफा

उत्तर भारत में सर्दियों की ठंड कमजोर पड़ते ही गेहूं की खेती पर खतरे के बादल दिखाई देने लगे हैं। मौसम के बदले मिजाज ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। दिसंबर और जनवरी के दौरान कड़ाके की ठंड नहीं पड़ने और दिन का तापमान लगातार बढ़ने से गेहूं की फसल पर सीधा असर पड़ रहा है। अगर यही स्थिति बनी रही तो गेहूं का दाना छोटा और हल्का रह सकता है और पैदावार में पंद्रह से बीस प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
मौसम का बदलाव क्यों बना बड़ी चुनौती
गेहूं की फसल को अच्छे विकास के लिए ठंडे मौसम की जरूरत होती है। इस समय फसल को चिलिंग आवर्स चाहिए ताकि पौधों में अच्छे कल्ले निकल सकें। जब तापमान सामान्य से ज्यादा हो जाता है तो फसल अपनी अवधि पूरी होने से पहले ही पकने लगती है। इसका सीधा असर दाने की भराव क्षमता पर पड़ता है। नतीजा यह होता है कि दाना पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता और गुणवत्ता के साथ उत्पादन भी घट जाता है। बदलता मौसम खेती के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है और इसका असर हर किसान महसूस कर रहा है।
बढ़ते तापमान से फसल को कैसे दें राहत
बढ़ते तापमान के प्रभाव को कम करने के लिए सबसे जरूरी है सही सिंचाई प्रबंधन। खेत में हल्की नमी बनाए रखना बहुत फायदेमंद होता है। शाम के समय हल्की सिंचाई करने से मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है और पौधों को राहत मिलती है। इसके साथ ही पोटैशियम सल्फेट के दो प्रतिशत घोल का छिड़काव करने से फसल को गर्मी के तनाव से लड़ने में मदद मिलती है। यह पोषक तत्व पौधों की सहनशीलता बढ़ाता है और दाना भरने की प्रक्रिया को बेहतर बनाता है।
ये भी पढ़ें PM Kisan Yojana: बड़ी खुशखबरी 9 करोड़ से ज्यादा किसानों के खाते में ट्रांसफर हुए 2000 रुपयेआधुनिक सिंचाई से बढ़ेगी पैदावार
स्प्रिंकलर से सिंचाई करने पर खेत की सूक्ष्म जलवायु ठंडी बनी रहती है। इससे फसल को अनुकूल वातावरण मिलता है और दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती। सही समय पर सिंचाई और संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर किसान बदलते मौसम के असर को काफी हद तक कम कर सकते हैं। थोड़ी सी सावधानी और सही तकनीक से गेहूं की फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है और अच्छी पैदावार हासिल की जा सकती है।
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